समस्याओं का भी अंबार: सैंकड़ों परिवार कमा रहे आजीविका
नावांशहर. निकटवर्ती ग्राम भूणी के लोग मन में बसी देव प्रतिमा को जब हाथों में छैनी लेकर पत्थर पर तराशना शुरू करते हैं तो पत्थर में भगवान के दर्शन कराने का हुनर सामने आता है। इस कला के लिए भूणी के मूर्तिकारों को देश-प्रदेश में याद किया जाता है। गांव के मूर्तिकारों के हाथों के हुनर के कायल राजस्थान सहित अन्य राज्यों के कला के चहेते भी है। यहां से मूर्तियां दिल्ली, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र के साथ नेपाल सहित अन्य देशों में पहुंच रही है। दूसरे राज्यों के लोग मूर्ति और मार्बल की पहचान कर मूर्तियों का आर्डर दे रहे हैं। यहां ४ इंच से लेकर १०८ फीट की प्रतिमाएं तैयार की जाती है।
पीतल की मूर्तियां बनाकर दिया कला का परिचय
भूणी के युवा राहुल नेहरा, मूर्तिकार ओमप्रकाश प्रजापत ने बताया कि यहां मकराना के संगमरमर के अलावा ग्राहकों की मांग अनुसार ये कारीगर बिजौलिया के पत्थर, भैंसलाना के काले पत्थर, करौली के लाल पत्थर, जैसलमेर के सुनहरे पत्थर और पहाड़पुर के गुलाबी पत्थर से बेजोड़ मूर्तियां बनाते हैं। इस गांव के हर गली मोहल्ले में काली माता, शिव परिवार, राम दरबार, हनुमान, राधा कृष्ण, स्वतंत्रता सेनानियों और महापुरुषों की मूर्तियां बनाते हुए लोग मिल जाएंगे। यहां के मूर्तिकारों ने महाराष्ट्र के नासिक जिले में मांगीतुंगी नामक स्थान पर पहाड़ को काटकर 108 फीट ऊंची भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा बनाई है। इसके साथ ही कलाकारों ने पीतल की मूर्तियां बनाकर भी कला का परिचय दिया है। जिसमें कुचामन के कनोई पार्क में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर तथा नासिक में 4-4 फीट के घोड़े पीतल की मूर्तियां बनाकर अलग प्रदर्शन किया।
1990 से मूर्तियों में भविष्य तराश रहे
भूणी गांव के लोग १९७० से कला में निपुण है। उस समय इस गांव को चक्की वाला गांव के नाम से पहचाना जाता था। बुजुर्ग मांगीलाल नेहरा ने बताया कि १९७० में पहाड़ी के पत्थर से ग्रामीण पत्थर की आटा पीसने वाली चक्की बनाते थे। जिसे हाथों से बनाया जाता था, वहीं मूर्तिकार ओमप्रकाश कुमावत ने बताया कि १९९० से ग्रामीण मूर्तियों में भविष्य तराश रहे हैं। देव प्रतिमाओं की अत्यधिक मांग के कारण करीब ६० परिवारों का गुजर बसर इस हुनर से हो रहा है। यहां २५ से अधिक कार्यस्थल है। यहां हजारों लोग मूर्ति कलां से जुड़े हुए हैं जो लोगों को स्वरोजगार दे रहे हैं। यहां ऑर्डर भी भरमार रहता है।
मुख्य बिजली की समस्या, नहीं मिल रही सरकारी सुविधाएं
भूणी गांव के मूर्तिकारों में बल्लाराम कुमावत, कानाराम प्रजापत, ईश्वर मेघवाल, ओमप्रकाश कुमावत, लिछमण स्वामी ने बताया कि भूणी गांव में मुख्य बिजली की समस्या है। यहां पर लोड का अभाव है तथा कटौती ज्यादा होने से काम प्रभावित होता है। गांव हाईवे से काफी दूर पड़ता है, ऐसे में बड़ी मूर्तियों के लिए जरूरी बड़ा पत्थर लेकर आने वाले भारी वाहन गांव तक पहुंच नहीं पाते हैं। तैयार बड़ी प्रतिमाओं को निर्धारित स्थान तक पहुंचना भी चुनौती से कम नहीं है। मूर्तिकार अब गांव छोडक़र किसी बड़े शहर या कस्बे में बसने लगे हैं। जागरूकता के अभाव में इन कलाकारों को हस्तशिल्प उद्योग के तहत मिलने वाली सरकारी सुविधा भी नहीं मिल पा रही है। बड़े उद्योग के लिए थ्री फेज कनेक्शन चाहिए जो नहीं मिल पा रहा है।