
The story of the struggle of Mundava BDO Savita T
मूण्डवा (नागौर). छह माह की शिशु अवस्था में एक बालिका की सगाई और बारह वर्ष की आयु होते-होते विवाह के बंधन में बंधना तथा बारहवीं पास करतेे-करते 18 वर्ष की आयु में ही गौना कर दिया जाता है। शहरी माहौल में इंग्लिश मीडियम से पढ़ी बालिका ठेठ ग्रामीण परिवेश में बहू बनकर जाती है। ससुराल पहुंचते ही पढ़ाई भी छूट जाती है, लेकिन जिद्द के आगे दादी सास, मां की भूमिका में आगे आती है। बहू की पढ़ाई चार साल बाद फिर से शुरू हो जाती है। शिक्षक, सहकारिता निरीक्षक के बाद आरडीएस बनकर विकास अधिकारी बनती है और बालिकाओं के लिए एक रॉल मॉडल के रूप में समाज में जाना पहचाना चहरा बन जाती है। कहने सुनने में यह किसी फिल्मी कहानी-सी प्रतीत होती है, लेकिन यह सच्ची कहानी है मूण्डवा विकास अधिकारी सविता टी की।
सविता टी मूल रूप से पाली जिले की रायपुर तहसील के बासियां गांव की रहने वाली हैं। उनके पिता तिलोकचंद बैरवाल काम काज के लिए बैंगलुरु चले गए। चार भाई-बहिनों में दूसरे नंबर की बेटी सविता की बाल्य अवस्था में ही अपने ही गांव के दूसरे मोहल्ले में रहने वाले ऊंकार राम जांगू के साथ सगाई कर दी गई। पांचवीं में पढ़ते समय बाल विवाह भी हो गया, लेकिन पढ़ाई जारी रखी। 12वीं कक्षा पास करते-करते जब 18 वर्ष की आयु हुई तो गौना कर वर्ष 1999 में ससुराल भेज दिया। ससुराल में सविता के लिए सबसे बड़ा संबल उसकी दादी सास जमुदेवी थी। जो उसे मां की तरह लाड-प्यार देती थी तथा उसकी भावनाओं की कद्र किया करती थी। यहीं से फिर से पढ़ाई की बात चली। उनके पति भी आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ चुके थे। उनकी भी फिर से दसवीं तक की पढ़ाई हो पाई। दादी सास के साथ-साथ सबसे बड़ा संबल मामी-ससुर के बेटे जेठ गोरधनराम से मिला। वे कम्पाउंडर हैं। उसने जब सविता की अंक तालिकाएं देखी तो परिवार वालों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
इन दो के अलावा उनके पिता ने लगातार प्रेरित किया। जिसके कारण चार साल बाद फिर से पढ़ाई की शुरुआत हुई। सविता को जब बीए करने की सहमति परिवार से मिल गई तो पढऩे तथा लिखने में भी एक बड़ी समस्या आकर खड़ी हो गई। क्योंकि उसकी बारहवीं तक की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम में हुई थी और यहां उसे प्राईवेट परीक्षा देने के लिए अंग्रेजी माध्यम की किताबें तक नहीं मिली। हिन्दी माध्यम की किताबें लेकर उनका अंग्रेजी में अनुवाद करना पड़ा। एकांत भी मिले तथा घर वालों के काम में हाथ भी बंटाती रहे इसके लिए खेत में बनी झुंपड़ी में पढ़ाई करने के साथ-साथ फसल की रखवाली भी करती।
छूट गई पढ़ाई
अंग्रेजी माध्यम से दसवीं व बारहवीं अच्छे अंकों से पास करने के बाद ससुराल में आते ही पढ़ाई पर विराम लग गया। कारण, परिवार में सवा दौ सौ बीघा जमीन और 40 से 50 गाय-भैंसें थी। खेती बाड़ी तथा घर के काम में हाथ बंटाने के लिए पढ़ाई छोडऩा मजबूरी बना। ठेठ ग्रामीण परिवेश में चूल्हे चौके से लेकर खेती बाड़ी तथा पशुओं के गोबर उठाने, दूध दूहने तक की सारी जिम्मेदारियां निभानी पड़ी।
मिली सफलताएं
बीए करने के साथ-साथ प्राईवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। बीए करते हुए बीएसटीसी में चयन हुआ, एक साल का प्रशिक्षण ही लिया था कि बीए होते होते बीएड में भी चयन हो गया। बीएसटीसी छोड़कर बीएड किया। वर्ष 2008 में तृतीय श्रेणी शिक्षक बनीं, पर मंजिल यह नहीं थी। अंग्रेजी में एमए किया। आरएएस की परीक्षा दी तो 2010 में सहकारिता निरी क्षक के पद पर चयन हुआ। डेढ़ साल बाद आरएएस की परीक्षा दी तो आरडीएस में चयन हुआ। जून 2011 में बाड़मेर के बालोतरा में विकास अधिकारी के पद पर नियुक्ति मिली।
बेटियों की पढ़ाई और संस्कार दोनों ही जरूरी
कोमल है कमजोर नहीं तू, शक्ति का नाम नारी है। जग को जीवन देने वाली, मौत भी तुमसे हारी है। यह गीत मेरे लिए जीवन गीत है। समाज में युवा पीढ़ी के निर्माण में मां की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण है इसलिए बेटियों की पढ़ाई और संस्कार दोनों ही जरूरी है।
सविता टी, विकास अधिकारी, मूण्डवा
Published on:
08 Mar 2018 11:01 pm
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