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समाज की डरावनी तस्वीर- नागौर में ढाई साल में 205 ने की आत्महत्या

World anti suicide day : सुसाइड के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि, युवाओं में घट जीवन के संघर्षों से लडऩे का हौसला, छोटी सी असफलता पर गले लगा रहे मौत, जिले में बढ़ रही है आत्महत्या की घटनाएं, ट्रेन से कटने व फांसी पर लटकने के मामले ज्यादा

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Suicide NEWS: पहले जमकर डांस, फिर उठा लिया यह कदम

Suicide NEWS: पहले जमकर डांस, फिर उठा लिया यह कदम

World anti suicide day नागौर. जीवन का दूसरा संघर्ष है, जो लोग जीवन में संघर्ष करते हैं, जिन लोगों ने विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष किया, उन्होंने सफलता को प्राप्त करते हुए जीवन में कीर्तिमान रचे हैं। आज देश एवं विश्व में जो लोग सफल हैं, उन्होंने हार, पीड़ा, संघर्ष, हानि और उन गहराइयों से अपना रास्ता निकाला है, जहां से सामान्य लोग झांकने में भी खौफ खाते हैं। जो लोग संघर्षों का सामना करने से कतराते हैं, वे जीवन से भी हार जाते हैं, जीवन भी उनका साथ नहीं देता। समाज में आजकल ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो जीवन के संघर्ष से हारकर मौत को गले लगा लेते हैं।

आत्महत्या करने वालों की संख्या में हुई बढ़ोतरी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिले में वर्ष 2017 में जहां 54 लोगों ने आत्महत्या की, वहीं वर्ष 2018 में 85 लोगों ने मौत को गले लगा लिया। इस वर्ष यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ रहा है। पिछले आठ महीने में 66 लोग आत्महत्या committed suicide in Nagaur कर चुके हैं। नागौर एसपी डॉ. विकास पाठक का कहना है कि सुसाइड की घटनाएं ज्यादा होने लगी हैं, जिनसे वे व्यक्तिगत रूप से परेशान हैं। जाने युवा किस दिशा में जा रहे हैं। समाज में बढ़ रही आत्महत्या की घटनाएं चिंता का कारण बनती जा रही है। इन्हें रोकने के लिए जल्द ही प्रभावी स्तर पर प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले दिनों में यह सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरेगी।

विद्यार्थियों में बढ़ आत्महत्या की प्रवृत्ति
राजस्थान प्रदेश की बात करें तो यहां हर साल 200 से अधिक छात्रों ने विभिन्न कारणों से आत्महत्या कर रहे हैं। पिछले तीन साल में प्रदेश में 618 छात्रों ने सुसाइड किया है, जबकि भारत में प्रति दिन 26 छात्र सुसाइड करते हैं। मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक डरावनी तस्वीर है, जिसे नहीं रोका गया तो आंकड़ा दिनों-दिन बढ़ता जाएगा।

जिले में पिछले तीन साल में आत्महत्या के मामले
वर्ष - दर्ज - मौत - पुरुष - महिला
2017 - 54 - 54 - 44 - 10
2018 - 82 - 85 - 65 - 20
2019 - 66 - 66 - 54 - 12

देश में मनोरोग विशेषज्ञों की भारी कमी
जेएलएन अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. शंकरलाल ने बताया कि युवाओं में दिन प्रति दिन तनाव बढ़ता जा रहा है। समाज में मनोरोगी बढ़ रहे हैं, लेकिन मनोरोग विशेषज्ञों की कमी है। भारत में मात्र 4 हजार मनारोग विशेषज्ञ हैं जबकि 14 हजार की आवश्कता है। यदि मनोवैज्ञानिकों की बात करें तो देश में एक हजार ही हैं, जबकि 21 हजार की आवश्यकता है। चिंता की बात यह भी है कि इनकी निकट भविष्य में पूर्ति होते नहीं दिख रही। नागौर जैसे बड़े जिले में भी एक मात्र मनोरोग विशेषज्ञ है।

पत्रिका व्यू- कैसे रोकें आत्महत्याएं
आत्महत्या की प्रवृत्ति खासकर बच्चों एवं युवाओं में ज्यादा बढ़ रही है। इसके लिए जितने जिम्मेदार ऐसा कदम उठाने वाले हैं, उतने जिम्मेदार हम भी हैं। भागदौड़ वाली जिंदगी में हमने अपने बच्चों पर ध्यान देना बंद कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि तनाव में जी रहे युवाओं को अपनी समस्या परिवार के लोगों, मित्रों एवं डॉक्टर को बताना चाहिए, ताकि समय रहते उसका समाधान किया जा सके। तनाव का इलाज नशे में नहीं ढूंढ़े, बल्कि इसके लिए उन्हें फिट एवं सक्रिय रहना चाहिए। माता-पिता को भी चाहिए कि वे अपने बच्चों की गतिविधि एवं शिक्षा पर ध्यान रखें। उनकी संगत का ध्यान रखें। बच्चों पर अपने विचार नहीं थोपें, इससे बच्चे तनाम में आकर अवसाद में चले जाते हैं।

युवाओं में सहन शक्ति नहीं रही
आत्महत्या करने का मुख्य कारण हमारा पाश्चात्य संस्कृति को फॉलो करना है। परिवार व रिश्ते दिनों-दिन छोटे होते जा रहे हैं। पहले संयुक्त परिवार में रहते थे तो किसी बच्चे को समस्या होने पर कोई न कोई बड़ा सदस्य बात संभाल लेता था, लेकिन आजकल के बच्चे परिवार व रिश्तेदारों से दूर हो गए। कामकाजी होने से मां-बाप बच्चों से दूर हो गए, परिवार में माहौल ऐसा बनने लग गया कि घर में बाहरी व्यक्ति को बच्चे स्वीकार ही नहीं कर पाते। दूसरा बड़ा कारण बच्चों के हाथों में मोबाइल आना भी है, सोशल मीडिया के साथ्ज्ञ पबजी जैसे गेम बच्चों को आत्महत्या की ओर धकेल रहे हैं।
- मनीष जोशी, व्याख्याता, समाजशास्त्र, बीआर मिर्धा कॉलेज, नागौर

तनाव व नशे की प्रवृत्ति मुख्य कारण
वर्तमान में युवा सहनशील नहीं रहा, वह कम समय में सबकुछ प्राप्त करना चाहता है। जब वह उसमें सफल नहीं होता है तो तनावग्रसत हो जाता है। यही तनाव लम्बे समय तक रहने से वह अवसाद में चला जाता है। अवसाद नाम मानसिक बीमारी इतनी घातक है कि इसमें 15 प्रतिशत लोग आत्महत्या कर लेते हैं। युवाओं में तनाव एवं नशे की प्रवृत्ति ही आत्महत्या के प्रमुख कारण हैं। इसके साथ प्रेम प्रसंग में असफल रहने पर भी युवा जिंदगी खत्म कर रहे हैं। जबकि जीवन एक संघर्ष है। जीवन जीने के दूसरे कई मायने हैं, जिसके माध्यम से व्यक्ति बहुत कुछ कर सकता है।
- डॉ. शंकरलाल, मनोरोग विशेषज्ञ, जेएलएन अस्पताल, नागौर

त्रिजटा ने कहा था - आत्महत्या करना समाधान नहीं
रामायण में बताया है कि माता सीता ने त्रिजटा को जब कहा कि तुम मेरे लिए चिता तैयार कर दो, मैं राम के विरह में ज्यादा दु:ख सहन नहीं कर सकती। उस समय विभीषण की बेटी त्रिजटा ने सीता को धैर्य बंधाते हुए कहा, ‘हे मैया आत्महत्या करना किसी समस्या का समाधान नहीं है।’ आजकल का युवा भी बिना सोचे-विचारे छोटी-मोटी बात को लेकर सीधे ही आत्महत्या कर लेता है जो कि किसी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि एक नए दु:ख का प्रादुर्भाव करता है। जीवन में उतार-चढ़ाव, सुख-दु:ख की घटनाएं आती रहती हैं। व्यक्ति को धैर्य के साथ और बुद्धि के साथ उस दु:ख से छुटकारा पाने की कोशिश करनी चाहिए।
- संत जानकीदास, केशवदास महाराज की बगीची, नागौर