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1983 में हुआ था मर्डर, 2004 में शख्स ठहराया गया दोषी, 43 साल तक लंबी लड़ाई के बाद मिला न्याय

Delhi High Court: 1983 के मर्डर केस में 2004 में उम्रकैद पाए मुकेश कुमार को 43 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट से राहत मिली है। दिल्ली हाई कोर्ट ने सबूतों की कमी के कारण बरी कर दिया।
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नई दिल्ली

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Saurabh Mall

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Updated: 20 Jun 2026, 8:37 PM IST

High Court judge vacancy in India

दिल्ली हाई कोर्ट - ANI फाइल फोटो

1983 Vinod Murder Case: 1983 में हुए एक हत्या कांड में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को 43 साल लंबे इंतजार के बाद बड़ी राहत मिली है। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि प्रॉसिक्यूशन पक्ष आरोपी के खिलाफ ठोस सबूत नहीं दे सका, इसलिए उसे बरी किया जाना चाहिए।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, यह मामला 1 दिसंबर, 1983 का है। जब दिल्ली के लाजपत नगर इलाके में डीटीसी बस के अंदर चाकूबाजी की घटना हुई थी। घटना में विनोद नामक युवक को चाकू मारा गया था, जबकि उषा और अशोक कुमार भी घायल हुए थे। बाद में विनोद की अस्पताल में मौत हो गई। पुलिस ने हत्या, हत्या के प्रयास और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की।

जांच के दौरान कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें मुकेश कुमार भी शामिल था। प्रॉसिक्यूशन पक्ष का दावा था कि बस में मौजूद आरोपियों ने महिलाओं से बदसलूकी की थी और विरोध करने पर हमला कर दिया। मामले की सुनवाई के बाद वर्ष 2004 में ट्रायल कोर्ट ने मुकेश कुमार को हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ उसने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।

हाई कोर्ट ने क्यों पलटा ट्रायल कोर्ट का फैसला?

दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने मामले की दोबारा समीक्षा करते हुए पाया कि मुकेश कुमार की भूमिका को लेकर पर्याप्त और ठोस सबूत मौजूद नहीं थे। अदालत ने कहा कि प्रॉसिक्यूशन यानी कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि मुकेश का मुख्य आरोपी के साथ हत्या करने का साझा इरादा था।

कोर्ट ने यह भी माना कि जिस कथित बयान ‘इसे मारो’ का जिक्र किया गया, उससे सीधे तौर पर हत्या की मंशा साबित नहीं होती। इसके अलावा बस के कंडक्टर समेत कुछ महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही भी अभियोजन पक्ष के दावों को पूरी तरह समर्थन नहीं देती थी। अदालत ने कहा कि संदेह का लाभ आरोपी को मिलना चाहिए और इसी आधार पर 2004 में सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया गया है।

कोर्ट ने आगे ये भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपील करने वाले को दोषी ठहराने में गलती की है। इसलिए 10 अगस्त, 2004 और 19 अगस्त 2004 के ऑर्डर रद्द किए जाते हैं। बता दें अपील करने वाले मुकेश कुमार ने पटियाला हाउस कोर्ट के 10 अगस्त, 2004 के फैसले को चुनौती देते हुए अपील की थी। जिसमें उसे इंडियन पीनल कोड के सेक्शन 302 और सेक्शन 34 के तहत जुर्म के लिए दोषी ठहराया गया था।

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