
अमेरिकी प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप। (फोटो : ANI)
America Differing Approaches Towards India and Pakistan: अमेरिका एक ही समय में भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के साथ स्वार्थपरक रिश्ते निभा रहा है। एक ओर जहां वह बाइडनकाल में पाकिस्तान के प्रति आए बदलाव के बाद उसके लिए नरम हुआ है तो दूसरी ओर भारत को बराबरी के बजाय अपनी शर्तों पर चलाना चाहता है। एक ओर अमेरिकी प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस में बुला कर पुचकारते हैं और दूसरी ओर अवैध नागरिकों का मामला हो, भारत पर टैरिफ हो, भारतीय नागरिकों की मौत हो या दूसरे मामले, वे भारत को डरा धमका कर रखना चाहते हैं। इस तरह वे केवल अपने मतलब तक ही दोनों देशों को अपने हिसाब से डील कर रहे हैं। इसमें भारत के प्रति राजनयिक शिष्टाचार हो या बराबरी का भाव कहीं नजर नहीं आता। इस संबंध में सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी की राय अहम मालूम होती है।
ब्रह्म चेलानी का विचार है कि भारत को गुपचुप सीमित करने की अमेरिकी नीति दक्षिण एशिया के प्रति शीत युद्ध के दौर की ओर लौटती दिख रही है, जिसमें वाशिंगटन पाकिस्तान को फिर से गले लगा रहा है और भारत के उदय को रोकने के उद्देश्य से एक व्यापक क्षेत्रीय रणनीति अपना रहा है। मार्च में भारतीय धरती पर अमेरिकी उप विदेश मंत्री ने घोषणा की थी कि वाशिंगटन भारत को अपना आर्थिक प्रतिद्वंद्वी बनने देकर चीन वाली गलती नहीं दोहराएगा। इस टिप्पणी से रणनीतिक हलकों में हलचल मच गई है।
चेलानी का मानना है कि चीन के प्रति अपने अधिक सुलहपूर्ण दृष्टिकोण के साथ, ट्रंप प्रशासन की नीति से संकेत मिलता है कि वह अब उन साझा लोकतांत्रिक मूल्यों' की धारणा को नहीं मानता है, जो पिछले दो दशकों से अमेरिका-भारत संबंधों का आधार रही है। दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री ने बार-बार कहा है कि वाशिंगटन का प्राथमिक क्षेत्रीय उद्देश्य किसी भी एक शक्ति को उपमहाद्वीप पर हावी होने से रोकना है। भारत में कई लोग इस उद्देश्य को भारत को सीमित रखने के चीन के अपने हित के समान मानते हैं।
उनका मानना है कि पश्चिमी देशों ने भारत और पाकिस्तान को एक ही श्रेणी में रखना शुरू कर दिया है, जिसमें उनके द्वारा प्रायोजित ट्रैक II पहलों के माध्यम से भारत-पाकिस्तान संवाद को बढ़ावा देने का बहाना भी शामिल है। भारत के साथ अमेरिकी संबंधों ने न केवल अपना रोमांटिक पहलू या रणनीतिक औचित्य खो दिया है, बल्कि यह स्पष्ट रूप से लेन-देन वाला संबंध बन गया है, जिसमें वाशिंगटन का ध्यान दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते प्रमुख बाजार में बड़ा हिस्सा हासिल करने पर केंद्रित हो गया है।
यह दुखद और चिंताजनक बात है कि पश्चिमी देशों ने भारत और पाकिस्तान को एक ही श्रेणी में रखना शुरू कर दिया है। ऐसा तब हो रहा है जब अमेरिकी प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच अच्छी दोस्ती है । जमीनी हकीकत यह है कि भारत ने किसी भी देश पर हावी होने की नीति नहीं अपनाई है, वह अपने देश की सीमाओं पर सुरक्षा चाहता है तो आतंकवाद और घुसपैठ रोकना चाहता है और देश के व्यापारिक हित की बात करता है तो यह किसी देश पर हावी होने वाली बात नहीं है।
बहरहाल, दक्षिण एशिया और इंडो पैसिफिक नजरिये से यह न तो सही है और न ही तर्कसम्मत है। क्योंकि आप अगर आतंकवाद को पोषित करने वाले पाकिस्तान और आतंकवाद प्रभावित देश भारत को एक ही नजरिये से देखते हैं तो ये हालात न केवल आतंकवाद को खत्म करने में बाधक होंगे, बल्कि राजनयिक लिहाज से भी यह सही नहीं होगा। अमेरिका को इस अंतर को तो समझना ही होगा।
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Published on:
27 Jun 2026 02:03 pm
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