
ग्लोबल इंडेक्स का 'झूठ' बेनकाब!
India Narrative War: आज जब भारत दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज पर खड़ा है, तब अंतरराष्ट्रीय सूचकांक हमारी तस्वीर धुंधली दिखा रहे हैं। हाल ही अमरीकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआइआरएफ) की उस रिपोर्ट पर काफी बवाल हुआ, जिसमें भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में विशेष चिंता वाला देश (सीपीसी) घोषित करने की सिफारिश की गई थी। यानी भारत में अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता को अल्जीरिया, कतर, इराक और कजाकिस्तान जैसे देशों के बराबर आंका गया।
ऐसा पहली बार नहीं है, जब भारत की छवि को वैश्विक स्तर पर कमजोर दिखाया गया हो। ज्यादातर ग्लोबल इंडेक्स यही कहानी कहते हैं। हंगर इंडेक्स, हैप्पीनेस और प्रेस फ्रीडम जैसे ग्लोबल सूचकांकों में भारत की गिरती रैंकिंग ने इस बहस को तेज कर दिया। हैरानी की बात यह है कि इन रिपोर्ट्स में भारत को उन देशों से भी पीछे रखा गया है जो गृहयुद्ध, कंगाली और तानाशाही से जूझ रहे हैं।
प्रेस स्वतंत्रता के मामले में भी भारत को उन देशों से नीचे रखा गया है, जिनकी संस्थागत आजादी खुद खतरे में है, तो पर्यावरण सुधारों में उल्लेखनीय कार्य करने वाला भारत 180 देशों में 176वें स्थान पर है। इससे पहले बॉटम पर था। यह समझना होगा कि ज्यादातर इंडेक्स अमरीका और यूरोपीय देश जारी करते हैं, जिनके दशकों पुराने मानक भारत से कभी मेल नहीं खाते। इस पूरे खेल से स्पष्ट है कि ये रिपोर्ट और इंडेक्स परसेप्शन (धारणा) पर आधारित हैं, न कि परफॉर्मेंस (प्रदर्शन) पर। सूचकांकों में यही विरोधाभास इन संस्थाओं की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
अधिकतर सूचकांकों के मानक दशकों पुराने हैं और यूरोपीय देशों की छोटी और समरूप आबादी के लिए बने हैं। जैसे 'हंगर इंडेक्स' में 'हाइट फॉर एज' को पैमाना माना जाता है, जबकि भारतीय बच्चों की कद-काठी उनके जेनेटिक्स और खान-पान की विविधता पर निर्भर करती है, न कि केवल कुपोषण पर। यह वैसा ही है जैसे किसी मछली की योग्यता उसके पेड़ पर चढऩे की क्षमता से मापी जाए।
इन रिपोट्र्स का सबसे बड़ा आधार 'ओपिनियन पोल' होता है। भारत जैसे 140 करोड़ की आबादी वाले देश में मात्र 3 से 4 हजार लोगों की राय से धारणा नहीं बनाई जा सकती। अक्सर ये सवाल पश्चिमी झुकाव वाले बुद्धिजीवियों से पूछे जाते हैं, जिससे परिणाम खास नजरिए को दर्शाते हैं, न कि जमीनी हकीकत को।
ये संस्थाएं भारत सरकार के आधिकारिक डेटा (जैसे एनएफएचएस या एनएसएसओ) को अक्सर 'संदेह' से देखती हैं और अपना खुद का अनुमानित डेटा इस्तेमाल करती हैं। विडंबना यह है कि यही संस्थाएं चीन या अन्य कई देशों के डेटा को बिना किसी ऑडिट के स्वीकार कर लेती हैं।
2025 के हंगर इंडेक्स में भारत को 102वें स्थान पर रखा गया है। विडंबना यह है कि श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देश भारत से ऊपर हैं, जिन्हें भारत स्वयं संकट के समय अनाज की खेप भेजता है। भारत की 'पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना' (जो 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देती है) को ये मानक पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं।
वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026 में पाकिस्तान (104) को भारत (116) से अधिक खुशहाल दिखाया गया है। यह वह देश है जो गंभीर आर्थिक मंदी और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। इससे बड़े अचरज की बात क्या होगी कि जो इराक, कांगो और वेनेजुएला अशांत देशों में शामिल हैं, वे हैप्पीनेस में भारत से काफी ऊपर हैं? रूस तो पीसफुल इंडेक्स में बॉटम 10 में है, जबकि हैप्पीनेस में वह भारत से कई पायदान ऊपर है।
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने भारत को 151वें स्थान पर रखा है, जबकि नेपाल और मालदीव जैसे देश, जहां मीडिया पर सरकारी नियंत्रण के मामले अक्सर आते हैं, भारत से बहुत बेहतर दिखाए गए हैं।
भारत में महिला सशक्तीकरण और 'बेटी बचाओ' जैसे आंदोलनों के बावजूद, भारत को 131वें स्थान पर रखा गया है, जबकि कई पारंपरिक समाज भारत से ऊपर हैं।
अधिकांश ग्लोबल इंडेक्स को त्रुटिपूर्ण बताते हुए भारत सरकार ने खुद ग्लोबल इंडेक्स जारी करने का फैसला किया है। इस वर्ष जनवरी में ‘रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स (आरएनआइ’ के साथ इसकी शुरुआत हो गई। इसमें भारत को 16वीं रैंक और अमरीका को 66वीं रैंक मिली है। इस तरह डेमोक्रेसी, हंगर और हैप्पीनेस सहित अन्य इंडेक्स भी जारी किए जाएंगे।
पश्चिमी संस्थानों द्वारा निर्मित अधिकांश ग्लोबल इंडेक्स वस्तुनिष्ठ कम और वैचारिक पूर्वाग्रहों से अधिक संचालित होते हैं, जिनकी पद्धति और मानदंड यूरो-अमरीकी अनुभवों को सार्वभौमिक मानकर तैयार किए जाते हैं। इसलिए भारत जैसे विशाल और विविध लोकतंत्र की जटिलताओं को ये सूचकांक प्रतिबिंबित नहीं कर पाते। विडंबना यह है कि जिन देशों की आंतरिक स्थिरता, सामाजिक समरसता और संस्थागत विश्वसनीयता गंभीर प्रश्नों के घेरे में है, वे बेहतर रैंकिंग प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रक्रिया में आंकड़ों का चयन और व्याख्या का पक्षपात भारत की प्रगति को धुंधला करता है। ‘रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स’ संतुलित वैश्विक विमर्श स्थापित करने की दिशा में एक समयोचित पहल है।
-विनय कौड़ा-अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
Published on:
01 Apr 2026 10:39 pm
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