
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट (Photo - ANI)
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट (Andhra PradeshHigh Court) ने वैवाहिक विवाद के मामलों में बड़ा आदेश सुनाया है। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि इन मामलों में पुलिस के पास कोई अधिकार नहीं है और ऐसे में उन्हें वैवाहिक विवाद से दूर रहना चाहिए। हाईकोर्ट ने पुलिस को इन मामलों में दखल न देने का निर्देश दिया है। जस्टिस सुनीता गंधम ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि पुलिस के पास सिविल विवाद सुलझाने का कोई अधिकार नहीं है।
भारतीय संविधान के अनुसार सिविल विवादों का समाधान करने का अधिकार न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं। यह काम न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं। अगर दो नागरिकों या समूहों के बीच कोई सिविल विवाद चल रहा है या ऐसा होने की संभावना है, तो इसमें हस्तक्षेप करना पुलिस के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और ऐसे में उन्हें इन विवादों से दूरी बनाए रखनी चाहिए।
मामला एक 44 वर्षीय व्यक्ति की याचिका पर आधारित है। उसने आरोप लगाया कि उसका अपनी पत्नी के साथ वैवाहिक विवाद चल रहा है और पुलिस इसमें दखल दे रही है। पुलिस उससे बच्चों को पेश करने की मांग कर रही थी और परेशान कर रही थी। याचिकाकर्ता ने बताया कि 2014 में दोनों की दूसरी शादी हुई थी और दो बच्चे हैं। 2020 में पत्नी ने उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, तेलंगाना हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की और रंगारेड्डी जिला परिवार न्यायालय में कस्टडी की याचिका भी लगाई। बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ और याचिकाकर्ता ने स्थायी गुज़ारा भत्ता का भुगतान किया। फिर भी पत्नी और उसके परिवार की तरफ से परेशानी जारी रही। पत्नी की तरफ से जवाब में कहा गया कि वैवाहिक और संबंधित मामले अदालतों में चल रहे हैं। उसने यह आरोप भी लगाया कि पति और ससुराल वालों ने उसे परेशान किया और बच्चों की कस्टडी छीन ली और बच्चों से मिलने का आवेदन जिला न्यायालय में लंबित है। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि दोनों पक्षों के बीच सिविल और वैवाहिक विवाद हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि जब कोई विवाद सिविल हो और कोई अपराध दर्ज न हो, तो पुलिस को दखलअंदाजी करने का कोई अधिकार नहीं है। जस्टिस गंधम ने कहा कि बच्चों से मिलने के अधिकार का तर्क संबंधित अदालत में रखा जाना चाहिए। यह याचिका पुलिस के हस्तक्षेप के खिलाफ है। सरकारी वकील ने कहा कि पुलिस ने सिविल विवाद में दखल नहीं दिया, सिर्फ आपराधिक मामले में नोटिस दिया। फिर भी कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वो याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी के वैवाहिक विवाद में कानून के अनुसार ही काम करें और बच्चों की उपस्थिति पर जोर न दें।
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा किसी मामले को कॉज़-लिस्ट में 'खारिज करने के लिए' शीर्षक के तहत सूचीबद्ध करने पर आपत्ति जताई है।
Updated on:
5 Sep 2026, 2:57 PM IST
Published on:
5 Sep 2026, 2:57 PM IST
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