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भाजपा ही नहीं, देश के लिए खतरे की घंटी हैं ऐसे ‘स्वतंत्र’

स्वतंत्र भारद्वाज और बक्सर के एक शिक्षक द्वारा जिस तरह गुनाह करके गर्व से उसका बखान किए जाने का मामला सामने आया है वह सरकार और समाज के लिए खतरे की घंटी है।
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नई दिल्ली

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Vijay Kumar Jha

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Updated: 5 Sep 2026, 2:34 PM IST

Swatantra Bhardwaj FIR Skull Scrap jantar mantar protest CJP

स्वतंत्र भारद्वाज (फोटो सोर्स: Swatantra Bhardwaj (कट्टर हिन्दू) फेसबुक पेज)

हाल की दो घटनाओं ने समाज में अपराध और अपराधियों की मनोवृत्ति को लेकर खतरनाक संकेत दिए हैं। एक घटना बिहार की है और दूसरी दिल्ली की। एक घटना शिक्षक द्वारा बच्चियों के बलात्कार की है और दूसरी एक व्यक्ति की पिटाई की। दोनों ही घटनाओं में अपराध करके अपराधी द्वारा 'गर्व' के साथ उसका बखान करने का मामला सामने आया है। 'मैंने इतना महान काम किया है और मेरा कुछ बिगड़ नहीं सकता' वाले भाव से! हालांकि, इस बखान के बाद दोनों की मुसीबत तो बढ़ी, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अपराध करने वालों की यह मनोवृत्ति समाज और सरकार को कितना सुरक्षित रहने देगी? इस सवाल पर विचार करने से पहले, संक्षेप में दोनों घटनाओं के बारे में बताता चलूं।

बिहार के बक्सर में सरकारी स्कूल के एक शिक्षक का कथित ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इसमें शिक्षक यह बताते हुए सुना गया कि उसने कई लड़कियों के साथ संबंध बनाए हैं और उनके वीडियो भी उसके पास हैं। इस ऑडियो की सच्चाई अभी साबित होनी है, लेकिन इसी बीच गांव में वीडियो वायरल हुआ तो गांववालों ने शिक्षक की पिटाई की। उन्होंने पुलिस को सामूहिक आवेदन भी दिया। फिर पीड़ित नाबालिग लड़की की मां ने लिखित शिकायत दी। इसके बाद पुलिस सक्रिय हुई। आरोपी हेड मास्टर मोहम्मद इमाम, शिक्षक अरविंद कुमार पुलिस की गिरफ्त में हैं और दूसरे शिक्षक वीरेंद्र कुमार की तलाश जारी है। खास बात है कि हेड मास्टर इमाम का नाम शिक्षक दिवस पर सम्मानित करने के लिए भेजा गया था, जिसे यह मामला सामने आने के बाद वापस लिया गया।

दूसरा मामला स्वतंत्र भारद्वाज का है। भारद्वाज ने खुले आम बताया कि उसने कैसे जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन के दौरान एक लड़की के पिता की पिटाई कर उनका सिर फोड़ दिया था और अपने 'संपर्कों' के दम पर उसका कुछ नहीं बिगड़ा। उसने सत्ताधारी दल के कई बड़े नेताओं का नाम लेते हुए उनसे करीबी संबंध होने का दावा भी किया। शेखी बघारने वाला वीडियो वायरल हुआ तो सीजेपी वालों ने कार्रवाई के लिए प्रदर्शन किया। फिर भारद्वाज पर कार्रवाई हुई और उसे पकड़ा भी गया। पांच सितंबर को कोर्ट ने उसे एक दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया। उसके समर्थक इसका विरोध कर रहे हैं और उसकी रिहाई के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं।

बक्सर की घटना के आरोपियों का किसी राजनीतिक दल से संबंध है या नहीं, उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है या नहीं — इन सवालों के जवाब अभी पता नहीं हैं, लेकिन भारद्वाज का साफ दावा है कि सत्ताधारी दल का साथ होना उसे बेखौफ बना चुका है।

'गर्व' असल में किसका है?

इन दोनों घटनाओं में जो सबसे डरावनी बात है, वह अपराध नहीं, बल्कि अपराध के बाद का आत्मविश्वास है। और यह भी कि, ये दो घटनाएं अपने आप में अकेली नहीं हैं।

कोई अपराधी जब सार्वजनिक रूप से, बिना किसी झिझक के, अपने कुकर्म का बखान करता है, तो वह अकेले अपने भीतर की क्रूरता नहीं दिखा रहा होता। वह यह भी बता रहा होता है कि उसने सत्ता-तंत्र को अपनी सुरक्षा की गारंटी मान लिया है। यह गर्व अपराध का नहीं, दंड से बचने के भरोसे का गर्व है। और यही भरोसा है जो असली खतरे की जड़ है। यह भरोसा सत्ताधारी दल के लिए ही नहीं, देश के लिए भी खतरे की घंटी है। इससे आम नागरिकों का पुलिस-प्रशासन, सत्ताधारी दल और अंततः सिस्टम में भरोसा कम होता है।

सत्ता का संरक्षण: सिर्फ एक घटना नहीं, व्यवस्था

भारद्वाज के दावे को महज़ एक व्यक्ति की डींग मारना समझना भूल होगी। यह उस व्यवस्था की झलक है जिसमें सत्ताधारी दल से नज़दीकी को सुरक्षा-कवच की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। चाहे सत्ता किसी भी पार्टी की हो। सइयां भए कोतवाल, डर काहे का! यह प्रवृत्ति दलगत नहीं, सत्तागत है। इसे रोकने के लिए राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय करने का वक्त आ गया है। दल चाहे सरकार में हों, या विपक्ष में, उनसे यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या वे अपने कार्यकर्ताओं के चाल-चरित्र पर नजर रखते हैं? क्या टिकट, पद, या संरक्षण देने से पहले चरित्र और आपराधिक पृष्ठभूमि की कोई गंभीर जांच होती है? आज की तारीख में इसका जवाब 'न' में ही होगा। 'हां' होता तो हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार के संगीन अपराधों जैसे आरोप में जेल तक जा चुके लोगों को ससम्मान पार्टी का सदस्य बनाना या बड़ा ओहदा देना आम बात न होती। लगता तो ऐसा है जैसे अपराध करके बच निकलने वालों को राजनीतिक लिहाज से 'ज्यादा योग्य' माना जाने लगा है। यह चलन राजनीति को और अधिक दूषित करते जा रहा है। इसीलिए राजनीतिक शुचिता के लिए अभियान चले, यह जरूरी हो गया है।

ऊपर के दो उदाहरणों में भी आरोपियों पर कार्रवाई तभी हुई जब व्यवस्था पर लोगों का दबाव पड़ा। सवाल सिर्फ बक्सर के शिक्षकों या दिल्ली के भारद्वाज का नहीं है। सवाल उस पूरी व्यवस्था का है, जिसके तहत अपराधियों में कानून का खौफ मिटता है और बच निकलने का भरोसा बढ़ता है।

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