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‘गांधी जी भाषण दे रहे थे, नेहरू भी साथ थे’, जब सभा के बाद सड़क पर रोने लगीं आशा भोसले, भावुक कर देगा वो किस्सा

Asha Bhosle No More: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को लाइव देखने वाले अब बहुत कम बचे हैं। आशा भोसले उनमें से एक हैं। किशोरावस्था में मुंबई आईं, तो शिवाजी पार्क में विशाल सभा देखी।

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भारत

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Mukul Kumar

Apr 12, 2026

राष्ट्र पिता महात्मा गांधी और आशा भोसले। (फोटो- ANI)

Asha Bhosle Interesting Facts: राष्ट्र पिता महात्मा गांधी को लाइव देखने वाले लोग अब दुनिया में बहुत कम ही बचे हैं। आशा भोसले भी उन लोगों में से एक थीं, जिन्होंने गांधी जी को करीब से देखा है और उनके भाषण को सुना है।

यह वो किस्सा है, जिसे सुनकर सभी की आंखें भर आती हैं। क्योंकि यह सिर्फ एक गायिका की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब देश आजादी की सांस लेने की तैयारी कर रहा था।

छोटी उम्र में बॉम्बे आईं थीं आशा

आशा के पिता दीनानाथ मंगेशकर साल 1942 में चल बसे थे। घर की हालत पतली थी। बड़ी बहन लता मंगेशकर पहले ही बॉम्बे आ चुकी थीं।

परिवार चलाने के लिए आशा भी छोटी उम्र में ही मुंबई आ गईं। उनके लिए यह नया शहर था। अनजान गलियां थीं। वह तब आशिरवाद अपार्टमेंट्स में ठहरी हुई थीं।

एक दिन आशा यूं ही बॉम्बे की सड़कों पर निकलीं। दादर के शिवाजी पार्क की तरफ से एक जबरदस्त शोर आ रहा था। भीड़ थी। झंडे थे। कुछ बड़ा हो रहा था।

भीड़ में घुस गईं और फिर जो देखा वो जिंदगी भर नहीं भूलीं

उत्सुकता में वो भी भीड़ में शामिल हो गईं। सामने एक विशाल सार्वजनिक सभा चल रही थी। स्वतंत्रता सेनानी भाषण दे रहे थे। और तभी आशा जी की नजर गांधी जी पर पड़ी।

वह सामने भाषण दे रहे थे। साथ में जवाहरलाल नेहरू थे, सरोजिनी नायडू थीं, मौलाना अबुल कलाम आजाद थे और जयप्रकाश नारायण भी।

आशा जी की मातृभाषा मराठी थी। हिंदी ठीक से समझ नहीं आती थी। लेकिन उन्होंने खुद कहा है कि भाषणों की गहराई और उस माहौल को बिना भाषा समझे भी महसूस कर पा रही थीं। गांधी जी की आवाज और उनकी मौजूदगी ने दिल पर ऐसा असर छोड़ा जो जिंदगी भर रहा।

गांधी जी की सभा के बाद रोने लगीं सड़क पर

भाषण के बाद गांधी जी की सभा खत्म हुई। जिसके बाद भीड़ बिखरी। और तब आशा जी को एहसास हुआ कि वो घर का रास्ता भूल गई हैं। नई-नई बॉम्बे आई थीं। आशिरवाद अपार्टमेंट्स कहां है यह याद नहीं था। इधर-उधर देखा। कुछ सूझा नहीं।

और थककर सड़क पर ही बैठ गईं और जोर-जोर से रोने लगीं। तभी एक राहगीर रुका। पूछा क्या हुआ? रोते हुए आशा जी ने कहा कि आशिरवाद अपार्टमेंट्स जाना है, रास्ता नहीं पता। उस आदमी ने हंसते हुए कहा- अरे, वो तो ठीक तुम्हारे सामने ही है।

कई बार आशा भोसले ने सुनाया यह किस्सा

यह किस्सा आशा भोसले ने कई बार सुनाया है, खासकर स्वतंत्रता दिवस के मौके पर। एक तरफ गांधी जी को देखने की वो भावुक याद और दूसरी तरफ घर के सामने खड़े होकर भी रास्ता न ढूंढ पाने वाली उस छोटी लड़की की मासूमियत।

बाद में उन्होंने 1954 की फिल्म जागृति में 'साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल' जैसे गाने गाए। यह गांधी जी को उनकी तरफ से एक श्रद्धांजलि थी। लेकिन जिस दिन उन्होंने उन्हें सच में देखा था, उस दिन वो बस एक अनजान शहर में खोई हुई एक छोटी लड़की थीं।