
15 अगस्त को आजादी के पक्ष में क्यों नहीं थे ज्योतिषी? फोटो सोर्स-Ai
Independence Day: जब अंग्रेजी हुकूमत से भारत की आजादी की घोषणा हुई, तो पूरा देश खुशी से झूम उठा। ढोल-नगाड़े, जश्न। लेकिन इसके साथ ही एक आशंका का भी जन्म हुआ। माथे पर बल पड़े और फिर शुरू हुआ ज्योतिषियों का मंथन।
दरअसल, माउंटबेटन द्वारा चुनी गई भारत की आजादी की तारीख पर ज्योतिषियों को आपत्ति थी। उनका मानना था कि 15 अगस्त देश के लिए शुभ नहीं है। भारत जैसा देश, जहां लगभग हर शुभ कार्य से पहले ज्योतिषियों से सलाह ली जाती है, वो देश की आजादी की तारीख पर उनकी राय के विपरीत कैसे जा सकता था। लेकिन आजादी की तारीख लॉर्ड लुई माउंटबेटन द्वारा चुनी गई थी और उसमें बदलाव की गुंजाइश लगभग न के बराबर थी। ऐसे में कोई बीच का रास्ता निकालना जरूरी था।
पवित्र नगरी वाराणसी के ज्योतिषियों के साथ-साथ दक्षिण भारत के कई ज्योतिषियों ने इस पर मंथन शुरू किया। आखिरकार ज्योतिष गुणा-भाग से एक ऐसा रास्ता निकला, जिसने भारत की आजादी के ऐतिहासिक क्षण में आधी रात को एक महत्वपूर्ण भूमिका में खड़ा कर दिया।
भारत की स्वतंत्रता की तारीख ब्रिटिश शासन के अंतिम महीनों में तय की गई थी। लॉर्ड माउंटबेटन ने 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता की तारीख घोषित की, जबकि सत्ता हस्तांतरण के लिए पहले जून 1948 की समयसीमा निर्धारित की गई थी। 15 अगस्त की तारीख आखिरी वायसराय के लिए खास महत्व रखती थी। ‘फ़्रीडम एट मिडनाइट’ के लेखकों लैरी कॉलिन्स और डॉमिनिक लापिएर के अनुसार, 15 अगस्त जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी वर्षगांठ थी। माउंटबेटन के लिए यह तारीख एशिया के एक पुराने दौर के अंत और “नए लोकतांत्रिक एशिया के जन्म” का उपयुक्त प्रतीक थी। द्वितीय विश्व युद्ध में माउंटबेटन ने जापान के खिलाफ सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया था। ऐसे में जापान के आत्मसमर्पण की तारीख को वह अपने गर्व से जोड़कर देखते थे और इसीलिए उन्होंने भारत की आजादी के लिए भी 15 अगस्त का दिन निर्धारित किया।
हालांकि, भारत के अधिकांश ज्योतिषी इस तारीख से खुश नहीं थे। दरअसल, 15 अगस्त 1947 शुक्रवार का दिन था और ज्योतिषियों के अनुसार, किसी राष्ट्र के जन्म जैसे ऐतिहासिक और निर्णायक अवसर के लिए शुक्रवार शुभ नहीं माना जाता।
इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तकIndia After Gandhi(2022) में लिखा है - रविवार निश्चित रूप से अशुभ दिन था और शुक्रवार भी ऐसा ही माना जाता था। माउंटबेटन की घोषणा के तुरंत बाद बनारस, दक्षिण भारत और कलकत्ता के ज्योतिषियों ने अपनी-अपनी गणनाएं कीं, चार्ट देखे। उनका मानना था कि बेहतर होगा कि भारत एक और दिन के लिए अंग्रेजों को बर्दाश्त कर ले, क्योंकि 15 अगस्त का अशुभ दिन उसके लिए कई बड़ी परेशानियां लेकर आ सकता है। बात देश के भविष्य की थी, इसलिए चिंता हर ओर थी, हर कोई आशंकित था और ये आशंका आजादी की मिठास को कुछ फीका कर रही थी।
कलकत्ता के ज्योतिषी स्वामी मदनानंद ने 15 अगस्त की तारीख के लिए अपना नवमांश तैयार किया। यह एक ऐसा ज्योतिषीय चार्ट था, जिसमें सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों, राशियों और 27 नक्षत्रों की स्थिति का अध्ययन किया जाता था। हालांकि, इसके परिणाम अच्छे नहीं मिले, इन गणनाओं ने किसी बड़ी आपदा का संकेत दिया।
स्वामी मदनानंद ने बताया कि 15 अगस्त को भारत मकर राशि के प्रभाव में रहेगा। मान्यताओं के अनुसार, यह एक ऐसी राशि है, जिसकी प्रमुख विशेषताओं में सभी विघटनकारी शक्तियों के प्रति निरंतर विरोध शामिल है और इसी कारण इसे भारत के विभाजन के लिए भी अशुभ संकेत माना गया। इस स्थिति को और गंभीर बनाने वाला एक अन्य पहलू था - शनि का प्रभाव। ज्योतिष शास्त्र में शनि एक अत्यंत अशुभ ग्रह माना जाता है। इसके साथ ही उस दिन भारत पर राहु का प्रभाव भी बताया गया। ज्योतिषियों ने राहु को तिरस्कारपूर्वक “बिना गर्दन वाला नक्षत्र” तक कहा - एक ऐसा खगोलीय प्रभाव, जिसके परिणामों को लगभग पूरी तरह अनिष्टकारी माना जाता था।
इन ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर यह कहा गया कि 15 अगस्त को स्वतंत्रता प्राप्त करना भारत के लिए गंभीर संकट और दुर्भाग्य का कारण बन सकता है। 14 अगस्त की आधी रात से लेकर 15 अगस्त तक शनि, बृहस्पति और शुक्र - तीनों ग्रह आकाश के सबसे अशुभ माने जाने वाले स्थान, यानी कर्मस्थान के नौवें भाव में स्थित होने वाले थे। इसके बाद माउंटबेटन को पत्र लिखकर आग्रह किया गया - भगवान के लिए, भारत को 15 अगस्त को स्वतंत्रता मत दीजिए। अगर इसके बाद बाढ़, सूखा, अकाल और नरसंहार जैसी त्रासदियां आती हैं, तो इसकी वजह यही होगी कि स्वतंत्र भारत का जन्म ऐसे दिन हुआ, जिसे सितारों ने अभिशप्त कर रखा था। हालांकि, अब स्वतंत्रता की तारीख बदलना संभव नहीं था। माउंटबेटन सार्वजनिक रूप से 15 अगस्त की घोषणा कर चुके थे और दूसरी ओर भारत के विभाजन तथा सत्ता हस्तांतरण की पूरी प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी थी।
‘फ़्रीडम एट मिडनाइट’ किताब में इस तारीख को माउंटबेटन का आवेग में लिया गया फैसला बताया गया है। किताब के अनुसार, आखिरकार ज्योतिषियों ने भारतीय नेताओं को सलाह दी कि 14 अगस्त को ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति कहीं अधिक अनुकूल होगी। इसके आधार पर यह फॉर्मूला निकाल गया - तारीख वही रखी जाए, लेकिन सत्ता हस्तांतरण का समय बदल दिया जाए। इसी के तहत 14 अगस्त को संविधान सभा का विशेष अधिवेशन बुलाया गया, जो आधी रात तक चला। इस व्यवस्था से यह सुनिश्चित हो गया कि सत्ता हस्तांतरण 15 अगस्त शुरू होते ही हो, यानी माउंटबेटन द्वारा घोषित तारीख भी बरकरार रहे और ज्योतिषियों की आपत्तियों का भी समाधान हो जाए।
इसके पश्चात जवाहरलाल नेहरू ने अपना ऐतिहासिक ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ भाषण दिया। उन्होंने कहा – “आधी रात के उस समय, जब दुनिया सो रही होगी… भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जाग उठेगा”। इस तरह, भारत की आजादी के साथ हमेशा के लिए जुड़ गई आधी रात की कहानी सामने आई।
Updated on:
15 Aug 2026, 6:01 PM IST
Published on:
15 Aug 2026, 6:00 PM IST
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