
अयोध्या का राम मंदिर और चंपत राय । ( फोटो : IANS )
Ayodhya Ram Mandir Donation Scam: अयोध्या में राम मंदिर के चंदे की चोरी के बाद पूरे देश और दुनिया में एक नाम की सबसे अधिक चर्चा है और वह है चंपतराय। आखिर कौन हैं चंपतराय। वे सत्ता के गलियारों के इतने नजदीक कैसे पहुंचे।क्या है उनका बैकग्राउंड । आइए जानते हैं। बिजनौर में जन्मे 79 वर्षीय राय कालांतर में अयोध्या के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति बन चुके थे। विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन कद्दावर नेता अशोक सिंहल के करीबी चंपतराय राजनीति के पायदान पर बहुत आगे निकल चुके थे। एक समय ऐसा भी आया, जब अयोध्या से जुड़ी हर चीज के चलते-फिरते ज्ञानकोश माने जाने वाले चंपत राय को 2020 में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का महासचिव नियुक्त किया जाना राम मंदिर के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए एक पुरस्कार के रूप में देखा गया। परिषद ने शुक्रवार को कहा था कि उसे अपने उपाध्यक्ष चंपत राय द्वारा श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव पद से इस्तीफा देने की कोई जानकारी नहीं है।
ध्यान रहे कि शुक्रवार को, मंदिर को दिए गए दान के कथित दुरुपयोग की जांच कर रहे जांचकर्ताओं की ओर से एक पूर्व सहयोगी को गिरफ्तार करने के बाद, उन्होंने कथित तौर पर पद से इस्तीफा दे दिया था। राम मंदिर की स्थापना के दो साल बाद, समाजवादी पार्टी के एक नेता द्वारा मंदिर में चढ़ावे की रकम के गबन का आरोप लगाने के बाद राय एक बार फिर सुर्खियों में आ गए।
उनके कैरियर से परिचित लोगों के अनुसार इस से पहले, राय सभी प्रमुख साधुओं से जुड़े हुए थे और मंदिर नगर के कई पहलुओं से अच्छी तरह वाकिफ थे। उनकी यात्रा की शुरुआत धामपुर, बिजनौर स्थित आरएसएम डिग्री कॉलेज में रसायन विज्ञान के व्याख्याता के रूप में हुई। सन 1977 में, जब आपातकाल लागू था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए व्याख्यान देते समय उन्हें उनके कॉलेज में गिरफ्तार कर लिया गय और उन्हें 18 महीने जेल में बिताने पड़े। रिहाई के बाद, उन्होंने अध्यापन छोड़ दिया और 1980 में विश्व हिंदू परिषद में शामिल हो गए। उसके बाद वे तत्कालीन विश्व हिंदू परिषद अध्यक्ष अशोक सिंघल के करीबी सहयोगी बन गए और उन्हें राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए युवाओं को संगठित करने के लिए अवध क्षेत्र में भेजा गया।
उन्होंने आगरा, देहरादून और हरिद्वार में संघ नेटवर्क को मजबूत किया, और अयोध्या उनका केंद्र बिंदु बन गया। 1980 और 90 के दशक में उनके साथ काम करने वाले लोग उन्हें "अयोध्या का विश्वकोश" कहते हैं। वे अयोध्या की गलियों, मुकदमों और संपत्ति के रिकॉर्ड से भलीभांति परिचित थे। जब राम जन्मभूमि के स्वामित्व का मुकदमा अदालतों में पहुंचा, तो वकीलों ने राय से ही संपर्क किया।
उन्होंने दस्तावेज उपलब्ध कराए, राजस्व मानचित्रों का पता लगाया और मौखिक इतिहासों का पुनर्निर्माण किया। परिणाम स्वरूप, उन्हें 'राम लला के अभिलेखपाल' की उपाधि से नवाजा जाने लगा।
उनके कई पीढ़ियों के भाजपा नेताओं के साथ भी उनके घनिष्ठ संबंध थे। 6 दिसंबर 1992 को, जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया गया था, तब वे कारसेवकों में शामिल थे।
सीबीआई ने आपराधिक साजिश के आरोप में उनका नाम आरोप पत्र में शामिल किया था। लगभग तीन दशक बाद, सितंबर 2020 में, लखनऊ की एक अदालत ने उन्हें और अन्य सभी आरोपियों को बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने जब 9 नवंबर, 2019 को स्वामित्व संबंधित मुकदमे पर अपना फैसला सुनाया, जिससे अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ, तो राय के दशकों के काम ने उन्हें नई संरचना के केंद्र में ला खड़ा किया।
बाद में वे राम मंदिर परियोजना के परिचालन प्रमुख बने। 5 अगस्त, 2020 को भूमि पूजन से लेकर 22 जनवरी, 2024 को भव्य उद्घाटन तक, चंपत राय प्रमुख व्यक्ति थे, वस्तुतः ट्रस्ट के वास्तविक अध्यक्ष थे क्योंकि ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास बीमार थे।
उन्होंने राम मंदिर के निर्माण के दौरान मीडियाकर्मियों को काम की प्रगति के बारे में जानकारी दी, डिजाइन फाइलों को मंजूरी दी और लार्सन एंड टुब्रो के इंजीनियरों के साथ समन्वय किया। उन्होंने सन 2021 में राष्ट्रव्यापी 'निधि समर्पण अभियान' का नेतृत्व किराम मंदिर की स्थापना के दो साल बाद, समाजवादी पार्टी के एक नेता द्वारा मंदिर में चढ़ावे की रकम के गबन का आरोप लगाने के बाद राय एक बार फिर सुर्खियों में आ गए।
बहरहाल आज राम मंदिर के चंदे के गबन के बाद उनका नाम देश और दुनिया के मीडिया में छाया हुआ है। तमाम आरोपों के बावजूद उनकी पहुंच और दबदबा साफ तौर पर नजर आ रहा है।
Updated on:
27 Jun 2026 11:30 am
Published on:
27 Jun 2026 11:24 am
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