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बंगाल चुनाव 2026: दीवारों पर लिखी जंग, रंगों में बसी राजनीति, डिजिटल युग में घोषणा पत्र को टक्कर दे रहे जीवंत संदेश

पश्चिम बंगाल के चुनावी रण में सियासी पारा हाई है। बंगाल के चुनावी माहौल में दीवारों पर राजनीतिक पार्टियों के श्लोगन और घोषणाएं लिखी गई हैं, जिनसे आम जनता को बड़ा संदेश मिल रहा है।

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Slogans written on the wall

पश्चिम बंगाल चुनाव: दीवारों पर लिखे श्लोगन और चुनावी वादे

West Bengal Assembly Elections 2026: पश्चिम बंगाल की 294 सीटों पर होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हैं। बंगाल के इस चुनावी माहौल में राजनीतिक पार्टियां ताबड़तोड़ रैलियां करके वोटर्स को अपने पाले में लाने का प्रयास कर रही हैं। वहीं, दूसरी तरफ दीवारों पर लिखे श्लोगन के जरिए चुनावी रण को धार मिल रही है।

डिजिटल युग को चुनौती दे रहे दीवारों पर लिखे श्लोगन

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक कहावत है- जो दीवार पर नहीं लिखा गया, वह मतदाता के मन पर भी नहीं लिखा जाएगा। डिजिटल दौर में जहां चुनावी जंग मोबाइल की छोटी स्क्रीन्स और एल्गोरिदम पर सिमट रही है। वहीं, बंगाल में की मिट्टी में पुरातन और कलात्मक परंपरा पूरी शिद्दत से अपनी सांसें ले रही है। कोलकाता की गलियों से लेकर गांव की दीवारों में 'देवल लिखन' यानी दीवार लेखन जीवंत चुनावी संदेश दे रहे हैं। दीवारों पर लिखे नारे यह बताते हैं कि ये केवल ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि एक जीवंत घोषणापत्र हैं, जो रील्स को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।

दीवारें दे रहीं संदेश

पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर सियासी माहौल गर्म है। इस चुनावी रण में शांति निकेतन में आर्ट्स कालेज की छात्रा रहीं शम्पा मुखर्जी कोलकाता में नेताओं के लिए स्लोगन लिखती हैं। शम्पा मुखर्जी बताती हैं कि बंगाल में चुनावों की दस्तक का पहला प्रमाण दीवारों पर चढ़ता रंग ही है। नीले-सफेद, भगवा और लाल रंगों के बीच छिड़ी यह जंग एक विजुअल ट्रीट की तरह है।

दीवारों पर कहीं तृणमूल कांग्रेस की लक्ष्मी भंडार वाली ममतामयी छवि है तो कहीं भाजपा का परिवर्तन वाला तीखा प्रहार। वामपंथियों का लाल रंग आज भी अपने पुराने वजूद को ढूंढने के लिए दीवारों पर हथौड़े-दरांती के साथ मौजूद है। दीवारों पर लिखे नारे जैसे-तुम्हारी टीम में मोदी-शाह, हमारी टीम में अकेली दुर्गा, यह दर्शाते हैं कि बंगाल की राजनीति आज भी व्यक्तिगत साख और सांस्कृतिक प्रतीकों पर टिकी है।

चुनावी नारों में पुराने व्यंग गायब

बंगाल चुनाव में इस बार के नारों में परंपरागत चुनावी कविताएं यानी छड़ा की कमी खल रही है। पिछले 5 चुनावों से नारे गढ़ने वाले देवब्रत भट्टाचार्य बताते हैं कि नारों की भीड़ में चुनावी कविताएं यानीअब छड़ा कहीं खो रही हैं। पहले दीवारों पर मजेदार व्यंग्य और तीखे छंद लिखे जाते थे। TMC आफिस में बैठे विद्यासागर चक्रवर्ती बताते हैं कि आज के राजनीतिक कार्यकर्ताओं में वह बौद्धिक गहराई नहीं है, जो समकालीन विषयों को चंद पंक्तियों में पिरो सकें। इसलिए अब रचनात्मक छंदों की जगह सीधे और सपाट नारे लिखे गए हैं। कार्टून भी विवादों के डर से कम ही नजर आ रहे हैं।

चुनावी श्लोगन में AI का नया तड़का

बंगाल के चुनाव प्रचार में पुरातन परंपरा व आधुनिक तकनीक के बीच हाइब्रिड मॉडल भी खूब लोकप्रिय हो रहा है। पुराने कार्यकर्ता दीवारें रंग रहे हैं, तो युवा पीढ़ी एआइ के जरिए नेताओं की रामभक्त या अन्य प्रतीकात्मक तस्वीरें बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर रहे हैं। चुनावी मीम भी खूब चल रहे हैं। इसके अलावा बंगाल में दीवारें यदि चुनावी कंटेंट पैदा करने का सबसे सस्ता और प्रभावी जरिया हैं तो गांवों में नुक्कड़ नाटकों के जरिए टीएमसी और भाजपा प्रचार कर रही हैं। एकल कलाकार या टोलियां मतदाता सूची से नाम कटने से लेकर भ्रष्टाचार तक को सहज भाषा में व्यक्त कर रहे हैं।