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Patrika Explainer: हिंदुत्व और घुसपैठ विरोध ने BJP को पूर्वी भारत में बनाया ताकतवर, CM शुभेन्दु का खुला ऐलान- ‘पहचानो, हटाओ, भगाओ’

घुसपैठियों के विरोध की राजनीति से पूर्वी भारत में बढ़ी BJP। बंगाल चुनाव में हिंदुत्व का साफ दिखा असर। आखिर त्रिपुरा में बीजेपी क्यों नहीं उठाती घुसपैठ का मुद्दा....
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कोलकाता

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Pushpankar Piyush

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Updated: 30 May 2026, 11:00 AM IST

CM Suvendu Adhikari

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी (सोर्स: ANI)

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी ने साफ तौर पर अपनी सरकार का एजेंडा बता दिया है। सीएम शुभेन्दु ने कहा कि हमारी सरकार घुसपैठियों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगी। बांग्लादेश से अवैध रूप से सीमा पार करके भारत में दाखिल होने वाले सभी को रोकना हमारी प्रमुख जिम्मेदारी है। बीजेपी सिर्फ बंगाल ही नहीं बल्कि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में घुसपैठ को प्रमुख मुद्दा मानती है। पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और असम के विधानसभा चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी के तमान बड़े नेताओं ने घुसपैठिये के मुद्दे पर तीखी बयानबाजी की।

राज्य भर में होल्डिंग सेंटर खोलने के निर्देश

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी ने राज्यभर में होल्डिंग सेंटर बनाने के आदेश दिए हैं। राज्य सरकार ने अपने आदेश में कहा कि MHA (गृह मंत्रालय) के दिशानिर्देशों के अनुसार, पकड़े गए विदेशियों के साथ-साथ उन विदेशी कैदियों के लिए भी होल्डिंग सेंटर स्थापित की जाए, जो अभी भी डिपोर्ट होने का इंतजार कर रहे हैं।

सीएम शुभेन्दु अधिकारी ने पहली कैबिनेट बैठक की मीटिंग में बांग्लादेश के साथ सीमा पर बाड़ लगाने के लिए सीमा सुरक्षा बल (BSF) को जमीन आवंटित करने का फैसला किया। उन्होंने साफ किया कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के दायरे में आने वाले लोग पूरी तरह से सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि हमारी नीति है—पहचानो, हटाओ और भगाओ।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कहा कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार आने के बाद घुसपैठ लगभग खत्म हो गई है। बंगाल ही उनका आखिरी रास्ता था। जो अब पूरी तरह से बंद हो गया है। अमित शाह ने कहा कि घुसपैठ देश की आंतरिक सुरक्षा का मामला बन गया था।

RSS ने भी हिंदुत्व और घुसपैठ के मुद्दे को दी धार

पूर्वी भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने घुसपैठ के मुद्दो को धार दी। RSS से जुड़ी संस्था विद्या भारती के प्रमुख रवि रंजन सेन ने कहा कि पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने असम आंदोलन के दिनों से ही अवैध घुसपैठ को एक राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया था। उन्होंने कहा कि हम वाम शासन के दौरान से घुसपैठ के मुद्दे पर प्रखर रूप से बोलते आए थे, लेकिन उस दौरान संघ का प्रभाव राज्य में सीमित था।

रवि रंजन ने आगे कहा कि यह मुद्दा इसलिए भी उस समय ज्यादा मुख्यधारा में नहीं आया क्योंकि बंगाल का भद्रलोक बंगाली उप-राष्ट्रवाद के विचार को प्रमुखता दे रहे थे। वह पूरे उस इलाके (बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल) को एक ही ईकाई के तौर पर देखते थे। भाषाई जुड़ाव को प्रमुखता देते थे, लेकिन बीते कुछ सालों में भद्रलोक और सब ऑल्टर्न के विचारों में बदलाव आया। सेन ने कहा कि कोलकाता ही आखिरी किला बचा था जिसे भेदना बाकी था, और यह बात कि राज्य BJP अध्यक्ष के तौर पर समिक भट्टाचार्य शहर के संभ्रांत लोगों से उन्हीं की भाषा में संवाद कर पाए, जबकि अधिकारी TMC के खिलाफ एक आक्रामक विरोधी के तौर पर उभरे, इस बात ने सुनिश्चित किया कि इस बार BJP कोलकाता में भी सेंध लगाने में कामयाब रही।

घुसपैठ का मुद्दा BJP के लिए वैचारिक आधार

असम में घुसपैठ का मुद्दा तो बरसों से रहा है। पांच दशक पहले 1979 से 1985 तक असम में आंदोलन हुए। हिंसा की बड़े पैमाने पर खबरें सामने आई। असमिया पहचान के आधार पर नई पार्टी असम गण परिषद का गठन तक हुआ, जो 1985 के विधानसभा चुनाव में जीतकर सत्ता में पहुंची। वहीं, धीरे-धीरे असमिया पहचान को बीजेपी ने राज्य में अपना प्रमुख मुद्दा बना लिया। असम के सीएम व बीजेपी नेता हिमंत बिस्वा सरमा मियां मुस्लिम की बात खुलकर करते हैं। हिमंत बिस्बा सरमा का कहना है कि बांग्लादेश की सीमा लगे असम के जिलों में डेमोग्राफिक बदलाव आया है। इससे असमिया पहचान संकट में आ गई है।

त्रिपुरा क्यों है अपवाद ?

इस क्षेत्र में एक अपवाद त्रिपुरा है। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान सोशल साइंटिस्ट सज्जन कुमार ने कहा कि त्रिपुरा में भाजपा इसलिए बाहरी बनाम अंदर की लड़ाई से बचती है क्योंकि यहां ज्यादातर प्रवासी हिंदू हैं, जो 1971 की जंग के दौरान पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भागकर भारत पहुंचे थे। अब वहां बंगाली हिंदू बहुसंख्यक हैं, जबकि त्रिपुरा के मूल आदिवासी अल्पसंख्यक हो गए हैं। BJP को बंगाली वोटों की ज़रूरत है, इसलिए वह वहां इस मुद्दे को ज्यादा तूल नहीं देती है।