
काला सागर। (फोटो- IANS)
Black Sea Indian Sailors: रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच ब्लैक सी में भारतीय नाविकों से जुड़े मामले पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान भारतीय नाविकों की स्थिति का पता लगाने और सरकार की भूमिका को लेकर कोर्ट में तीखी बहस हुई। मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि भारतीय नाविकों के मामले में पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं। वकील ने आरोप लगाया कि विदेश मंत्रालय ने नाविकों की स्थिति का पता लगाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा क्या आप चाहते हैं कि हम दिल्ली पुलिस को यूक्रेन भेज दें? उन्होंने कहा कि मामला एक ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से जुड़ा है जिसमें एक नाविक विदेशी देश के संप्रभु क्षेत्र में बने युद्ध जैसे हालात के बीच लापता हुआ है।
केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि भारतीय दूतावास यूक्रेन, रोमानिया और दूसरे संबंधित देशों के दूतावासों के संपर्क में हैं। सरकार मामले में उपलब्ध कूटनीतिक माध्यमों से जानकारी जुटा रही है। याचिकाकर्ता के वकील ने दावा किया कि रोमानिया के राजदूत ने बताया है कि 26 जुलाई के बाद कोई खोज और बचाव अभियान नहीं चलाया गया।
केंद्र की ओर से पेश वकील जे. बागची ने कहा कि दूसरे देश के संप्रभु क्षेत्र में शत्रुतापूर्ण कार्रवाई से जुड़े मामले में भारत की कार्रवाई की कुछ सीमाएं हैं। उन्होंने कहा कि संबंधित देशों ने औपचारिक रूप से युद्ध की घोषणा नहीं की है। ऐसे में जिनेवा कन्वेंशन को उस तरह लागू नहीं किया जा सकता जैसा याचिकाकर्ता की तरफ से कहा जा रहा है।
केंद्र ने कहा कि विदेश मंत्रालय अधिकतम नाविकों के परिवारों को संबंधित शिपिंग कंपनियों से मुआवजा हासिल करने में मदद कर सकता है। इस पर कोर्ट ने पूछा कि क्या सरकार की एजेंसी की सीमाओं पर बात होगी या परिवारों को मुआवजा दिलाने में मदद की जाएगी। सरकार की तरफ से कहा गया कि मौत का प्रमाण पत्र नहीं होने पर मुआवजा नहीं दिया जा सकता।
याचिकाकर्ता के वकील ने नाविकों को युद्ध प्रभावित इलाकों में भेजे जाने के तरीके पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि नाविकों को इन खतरनाक क्षेत्रों में काम करने के लिए मजबूर तो नहीं किया गया था। वकील ने अदालत से नाविकों के रोजगार अनुबंधों की जांच करने की मांग की, ताकि यह पता चल सके कि उन्हें संघर्ष प्रभावित समुद्री इलाकों में जाने के लिए बाध्य किया गया था या नहीं। वकील ने मामले से जुड़े अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने के लिए समय मांगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई टाल दी।
Updated on:
8 Sep 2026, 7:14 PM IST
Published on:
7 Sep 2026, 6:14 PM IST
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