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बंगाल बॉर्डर पर चुनावी हकीकतः 569 KM की खुली सरहद और सम्मान की जंग, घुसपैठियों पर घमासान

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Elections) को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हैं। इस बार के चुनाव में बीजेपी घुसपैठियों के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रही है। बांग्लादेश से सटी पश्चिम बंगाल की सीमा क्षेत्र में कैसा चुनावी माहौल है, आइए जानते हैं…

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Borders of India and Bangladesh in West Bengal

पश्चिम बंगाल में भारत और बांग्लादेश की संवेदनशील सीमाएं

टाकी बॉर्डर से पश्चिम बंगाल के इस आखिरी छोर के आसपास खड़ी ऐतिहासिक हवेलियां खामोश हैं, लेकिन शाम के वक्त जब ऐतिहासिक राजबाड़ी घाट पर सूरज ढलता है तो इछामती नदी के शांत पानी के ऊपर से एक आवाज तैरती हुई आती है। यह बांग्लादेश के सतखिरा जिले के किसी गांव से आने वाली अजान है। कुछ ही पलों में भारत की ओर से मंदिरों के घंटों की आवाज भी हवा में घुल-मिल जाती है। यह दृश्य जितना सुकून देने वाला है, यहां की चुनावी हकीकत उतनी ही बेचैन करने वाली है। यहां सरहदें कंटीली तारों से नहीं, बल्कि लहरों से तय होती हैं और इस बार उन लहरों में 'संदेशखाली' का शोर भी समाहित है।

569 किलोमीटर की खुली सीमा, बीजेपी का सबसे बड़ा दांव

भारत-बांग्लादेश की करीब 4096 किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसका 30 फीसदी हिस्सा प्राकृतिक रूप से खुला या जलीय है। इसमे 569 किलोमीटर नदियों की खुली सीमा है। यहां से घुसपैठ होने का दावा किया जाता रहा है। भाजपा के लिए यही घुसपैठ चुनाव का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट है। उत्तर 24 परगना और मालदा जैसे जिलों में नदी मार्ग होने के कारण बाड़ लगाना नामुमकिन रहा है।
भाजपा उम्मीदवार इसी खुली जल-सीमा को घुसपैठ और तस्करी का सेफ पैसेज बताकर राष्ट्रवाद के मुद्दे को हवा दे रहे हैं। भाजपा का तर्क है कि जब सरहदें इतनी खुली हों कि सरहद पार की 'अजान' भी साफ सुनाई दे तो वहां बिना कड़े प्रशासन के सुरक्षा मुमकिन नहीं है।

संदेशखाली में सम्मान बना चुनावी नारा

बशीरहाट लोकसभा सीट और संभाग के भीतर आने वाला 'संदेशखाली' अब केवल एक गांव ही नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय टीस बन चुका है। यहां महिलाओं के उत्पीड़न और स्थानीय रसूखदारों के खौफ के कथित साम्राज्य से ममता बनर्जी सरकार के मां-माटी-मानुष के नारे को सीधी चुनौती मिल रही है। टाकी के मतदाताओं के मन में यह सवाल गहरा है कि यदि संदेशखाली जैसा इलाका सुरक्षित नहीं रहा तो इस खुली और संवेदनशील सरहद पर उनकी सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?

सियासी अखाड़ा: साख बनाम सुरक्षा

TMC विकास और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के साथ अपनी साख बचाने की कोशिश कर रही है। संदेशखाली में बड़ी संख्या में वोटर लिस्ट में मतदाताओं के नाम कट गए हैं। भाजपा का आरोप है कि संदेशखाली के शाहजहां शेख जैसे किरदारों को इसी खुली सीमा और प्रशासनिक ढील ने फलने-फूलने का मौका दिया। बशीरहाट दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के भाजपा उम्मीदवार डॉ. शौर्य बनर्जी का कहना है बांग्लादेश की खुली सीमा घुसपैठ का सबसे बड़ा जरिया है। हमारी सरकार बनते ही इसकी निगरानी और सख्त की जाएगी। वह NRC को कोई मुद्दा नहीं मानते हैं।

विचित्र विरोधाभास और खामोश मतदाता

इछामती नदी की लहरों के बीच बीएसएफ की गश्ती नावें और सरहद पार से आती आवाजें एक विचित्र विरोधाभास पैदा करती हैं। यहां का मतदाता फिलहाल खामोश है, लेकिन यह खामोशी किसी बड़े सियासी तूफान की आहट हो सकती है। जाहिर है जब सीमा की बाड़ कागजों में अटकी हो तो जनता अपनी सुरक्षा की बाड़ वोट के जरिए खींचने को मजबूर होती है।

इछामती नदी की सांझी विरासत

यहां के सतेन चटर्जी बताते हैं दशमी के दिन इछामती नदी में होने वाला दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन पूरी दुनिया में मशहूर है। मुर्ति विसर्जन के दौरान भारत और बांग्लादेश की नावें एक-दूसरे के इतने करीब आ जाती हैं कि लोग एक-दूसरे को मिठाई बांटते हैं और गले मिलते देखे जा सकते हैं। यह सरहद की 'कठोरता' पर 'संस्कृति' की सबसे बड़ी जीत का दृश्य होता है।

हिल्सा की सांझी विरासत

संदेशखाली की संजोमती का कहना है कि हिल्सा मछली का स्वाद यहां की सांझी विरासत है। पदमा और इछामती नदी की मछलियां बांग्लादेश और भारत दोनों देशों की रसोइयों में एक ही तरह के मसालों के साथ पकती हैं। खान-पान की यह समानता राजनीतिक तनाव के बीच भी एक पुल का काम करती है। सीमा के दोनों ओर कई ऐसे परिवार हैं, जिनके रिश्तेदार सरहद के उस पार रहते हैं। शादी-ब्याह और गमी के मौकों पर आज भी यहां की हवाओं में एक-दूसरे के लिए फिक्र महसूस की जा सकती है। 75 वर्षीय बुजुर्ग अली मियां कहते हैं कि सरहदें अक्सर कटीले तारों से दिलों को बांटने की कोशिश करती हैं, लेकिन टाकी की इछामती नदी गवाह है कि संस्कृति का पानी इन तारों के नीचे से बहकर दोनों मुल्कों को एक ही रंग में भिगो देता है।