
ब्रिक्स समिट के दौरान पुतिन, मोदी और जिनपिंग (Photo-X @BRICSinfo)
BRICS Summit 2026: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को 18वें ब्रिक्स समिट का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन में व्यापार, स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन, वित्तीय सहयोग, तकनीक, AI, ऊर्जा, ग्लोबल साउथ की भूमिका और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। ब्रिक्स अब 11 पूर्ण सदस्यों वाला समूह बन चुका है- ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया और सऊदी अरब। यह समूह विश्व की लगभग आधी आबादी, वैश्विक जीडीपी का करीब 40 प्रतिशत (पीपीपी के आधार पर) और वैश्विक व्यापार का लगभग 26 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है।
आईएमएफ के 2026 के अनुमानों के मुताबिक, क्रय शक्ति समानता (PPP) के आधार पर ब्रिक्स देशों की वैश्विक जीडीपी में संयुक्त हिस्सेदारी करीब 40.98 प्रतिशत है। हालांकि, इस समूह के भीतर आर्थिक ताकत का वितरण बेहद असमान है।
दरअसल, चीन अकेले वैश्विक जीडीपी में 19.88 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे आगे है, जबकि भारत की हिस्सेदारी 8.49 प्रतिशत है। इसके बाद रूस 3.38 प्रतिशत, इंडोनेशिया 2.45 प्रतिशत, ब्राजील 2.35 प्रतिशत, सऊदी अरब 1.30 प्रतिशत, मिस्र 1.15 प्रतिशत, ईरान 0.80 प्रतिशत, दक्षिण अफ्रीका 0.48 प्रतिशत, संयुक्त अरब अमीरात 0.45 प्रतिशत और इथियोपिया 0.25 प्रतिशत के साथ आते हैं।
इसका अर्थ है कि चीन की आर्थिक हिस्सेदारी भारत से दोगुने से भी अधिक है, जबकि बाकी अधिकांश ब्रिक्स सदस्य चीन और भारत की तुलना में काफी छोटे आर्थिक आकार वाले हैं। यह आंकड़ा बताता है कि ब्रिक्स का सामूहिक आर्थिक वजन भले ही वैश्विक स्तर पर 40 फीसदी से अधिक हो गया हो, लेकिन समूह के भीतर आर्थिक शक्ति का बड़ा हिस्सा अभी भी चीन के पास केंद्रित है।
ब्रिक्स देशों के दो दिवसीय शिखर सम्मेलन के पहले दिन सदस्य देशों ने नई दिल्ली घोषणा को सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी। दरअसल, यह सहमति ऐसे समय बनी है जब समूह के भीतर ईरान युद्ध और यूक्रेन संकट जैसे मुद्दों पर गहरे मतभेद मौजूद हैं।
नई दिल्ली घोषणा में मध्य पूर्व की स्थिति पर चिंता जताते हुए सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने की अपील की गई है। हालांकि, घोषणा में अमेरिका-इजरायल के हमलों या ईरान की ओर से खाड़ी देशों को निशाना बनाए जाने की सीधे तौर पर निंदा नहीं की गई। इसी तरह वैश्विक व्यापार युद्ध और एकतरफा शुल्क नीतियों पर चिंता जताई गई, लेकिन अमेरिका का नाम नहीं लिया गया।
अल जजीरा की नई दिल्ली से रिपोर्टिंग के मुताबिक, ब्रिक्स नेताओं ने संवेदनशील मुद्दों पर किसी देश का नाम लेने से परहेज किया। खास तौर पर अमेरिकी टैरिफ के मुद्दे पर भी यही रणनीति अपनाई गई। भारत, रूस और चीन जैसे देश अमेरिकी व्यापार नीतियों से प्रभावित हुए हैं, लेकिन घोषणा में अमेरिका को सीधे निशाना नहीं बनाया गया।
नई दिल्ली सम्मेलन का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के समर्थन का है। घोषणा में कहा गया कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था से उभरते बाजारों और विकासशील देशों के लिए आर्थिक विकास और वैश्विक सहयोग के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
राष्ट्रपति पुतिन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग की। वहीं शी जिनपिंग ने कहा कि ब्रिक्स देशों को वैश्विक व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण और समान बनाने में भूमिका निभानी चाहिए।
पीएम नरेंद्र मोदी ने इसी विचार को 'रूल-टेकर' से 'रूल-शेपर' बनने के रूप में पेश किया। उन्होंने कहा कि दुनिया में विशेषाधिकार की मौजूदा 'पिरामिड' व्यवस्था को साझेदारी के मंच में बदलना होगा।
लेकिन यहीं ब्रिक्स की सबसे बड़ी चुनौती भी सामने आती है। एक तरफ समूह वैश्विक व्यवस्था में पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने की बात करता है, दूसरी तरफ उसके सदस्य देशों के अमेरिका, यूरोप और अन्य पश्चिमी देशों के साथ महत्वपूर्ण व्यापारिक और रणनीतिक संबंध हैं।
भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। नई दिल्ली ब्रिक्स में ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करना चाहती है, लेकिन वह इसे अमेरिका-विरोधी गठबंधन में बदलने के पक्ष में नहीं है।
ब्रिक्स की शुरुआत 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ BRIC के रूप में हुई थी। बाद में दक्षिण अफ्रीका और अन्य देशों के शामिल होने के साथ इसका विस्तार हुआ। अब यह 11 देशों का समूह है और दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं को पश्चिमी वर्चस्व वाली वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रभाव दिलाने की कोशिश करता है।
नई दिल्ली सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी, इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो भी हिस्सा लिया। संयुक्त अरब अमीरात ने अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान को प्रतिनिधि के तौर पर भेजा था। ब्राजील की ओर से विदेश मंत्री माउरो विएरा सम्मेलन में शामिल हुए।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के प्रमुखों की मौजूदगी भी सम्मेलन के व्यापक वैश्विक महत्व को दर्शाती है।
भारत के लिए इस सम्मेलन की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि क्या वह बढ़े हुए और विविध हितों वाले ब्रिक्स को किसी साझा रणनीतिक दिशा में आगे ले जा पाएगा?
मध्य-पूर्व युद्ध, यूक्रेन संकट, व्यापारिक टैरिफ, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और आपूर्ति श्रृंखला जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के हित कई बार एक-दूसरे से टकराते हैं। ऐसे में नई दिल्ली घोषणा-पत्र भले ही साझा सहमति का संदेश देता हो, लेकिन असली चुनौती इस सहमति को ठोस आर्थिक और रणनीतिक सहयोग में बदलने की होगी।
भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या यह समूह सिर्फ पश्चिमी व्यवस्था के विकल्प की बात करेगा या वास्तव में ग्लोबल साउथ के लिए एक प्रभावी आर्थिक और राजनीतिक मंच बन सकेगा?
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए BRICS सम्मेलन इसलिए भी अहम रहा क्योंकि इतने विविध हितों वाले देशों के बीच सर्वसम्मति से संयुक्त घोषणा पारित कराने में भारत सफल रहा।
मध्य पूर्व और यूक्रेन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अलग-अलग राय रखने वाले देशों के बीच सहमति बनाना आसान नहीं था।
संयुक्त घोषणा में मध्य पूर्व में संयम बरतने और तनाव कम करने की अपील की गई। यह भारत के लिए उस कूटनीतिक संतुलन को दिखाने का अवसर भी था, जिसमें वह अलग-अलग ध्रुवों के देशों के साथ संवाद बनाए रखना चाहता है।
BRICS की शुरुआत 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी। बाद में दक्षिण अफ्रीका इसका हिस्सा बना। पिछले करीब दो वर्षों में ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, इथियोपिया, सऊदी अरब और इंडोनेशिया जैसे देश भी इसमें शामिल हुए।आज यह 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है।
BRICS का प्रमुख उद्देश्य वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करना है। समूह चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसी पारंपरिक पश्चिमी संस्थाओं में विकासशील देशों की भूमिका और प्रभाव बढ़े।
हालांकि, BRICS की तुलना NATO या G7 जैसे संगठनों से करना आसान नहीं है। NATO की तरह इसकी कोई सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था नहीं है और न ही G7 जैसी स्पष्ट वैचारिक या राजनीतिक एकरूपता।
Updated on:
14 Sept 2026 05:32 pm
Published on:
14 Sept 2026 05:32 pm
