17 मई 2026,

रविवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

300 साल बाद भारत लौटा चोल साम्राज्य का शाही खजाना: नीदरलैंड्स से आई 30 KG की मुहर और 21 तांबे की प्लेटें

11वीं सदी का वो शाही खजाना, जिसे फिरंगियों ने 300 साल पहले भारत से लूटा था, आखिरकार वतन वापस आ गया है।

3 min read
Google source verification

भारत

image

Ankit Sai

image

Ankit Sai

May 17, 2026

Chola Copper Plates Return India

Chola Copper Plates Return India

Chola Copper Plates Return India: 300 साल पहले फिरंगियों द्वारा लूटा गया चोल साम्राज्य का 30 किलो का शाही खजाना आखिरकार भारत वापस लौट आया है। नीदरलैंड्स में डच पीएम की मौजूदगी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इन ऐतिहासिक 21 ताम्रपत्रों को स्वीकार किया। 11वीं सदी के इन शिलालेखों पर चोल वंश की शाही मुहर लगी है और इस पर संस्कृत व तमिल में राजा राजा चोल के आदेश दर्ज हैं। साल 2012 से चल रही कानूनी लड़ाई के बाद भारत को यह बड़ी कूटनीतिक जीत मिली है।

300 साल बाद भारत लौटा खजाना

भारत ने नीदरलैंड्स से 11वीं सदी के ऐतिहासिक 'चोल ताम्रपत्रों' (Chola Copper Plates) को वापस लाकर एक बहुत बड़ी कूटनीतिक और सांस्कृतिक जीत हासिल की है। शनिवार को एक बेहद हाई-प्रोफाइल कार्यक्रम में इन बेशकीमती ऐतिहासिक दस्तावेजों को भारत को सौंप दिया गया। इस ऐतिहासिक पल के गवाह खुद पीएम नरेंद्र मोदी और डच प्रधानमंत्री रॉब जेटन बने। यह कामयाबी दिखाती है कि कैसे भारत विदेशी धरती पर मौजूद अपनी चोरी हुई विरासत को वापस लाने में लगातार बड़ी सफलता हासिल कर रहा है।

उधर, पीएम मोदी यूएई के संक्षिप्त दौरे के बाद शुक्रवार को नीदरलैंड्स पहुंचे थे। यह उनके पांच देशों के व्यापक दौरे का दूसरा पड़ाव है, जिसमें स्वीडन, नॉर्वे और इटली भी शामिल हैं। शनिवार को हुए इस हैंडओवर समारोह ने भारत और नीदरलैंड्स के बीच गहरे रणनीतिक और सांस्कृतिक रिश्तों को दुनिया के सामने एक नए रूप में पेश किया है।

हर भारतीय के लिए गर्व का पल

इस बड़ी कामयाबी पर गर्व जताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर अपनी खुशी साझा की। उन्होंने लिखा, हर भारतीय के लिए यह एक अत्यंत हर्ष का क्षण है! 11वीं शताब्दी के चोल कालीन ताम्र-पत्र नीदरलैंड से भारत वापस लाए जाएंगे। प्रधानमंत्री रॉब जेटन की उपस्थिति में आयोजित इस समारोह में मैंने भी भाग लिया। इसके तुरंत बाद एक और पोस्ट में पीएम मोदी ने इन ताम्रपत्रों के ऐतिहासिक महत्व और कलात्मकता की तारीफ करते हुए लिखा, चोल ताम्र-पत्र 21 बड़ी और 3 छोटी पट्टियों का एक समूह हैं, जिन पर मुख्य रूप से प्राचीन तमिल भाषा में लेख अंकित हैं जो दुनिया की सबसे सुंदर भाषाओं में से एक है।

ये ताम्र-पत्र महान राजेंद्र चोल प्रथम द्वारा अपने पिता, राजा राजराज प्रथम के एक मौखिक वचन को औपचारिक रूप देने से संबंधित हैं। ये चोलों की महानता को भी दर्शाते हैं। हम भारतीय चोलों, उनकी संस्कृति और उनकी समुद्री शक्ति पर अत्यंत गर्व करते हैं।

21 ताम्रपत्र, 30 किलो वजन और चोल वंश की शाही मुहर

भारत सरकार साल 2012 से ही इन प्राचीन शिलालेखों को वापस लाने के लिए लगातार कोशिशें कर रही थी। नीदरलैंड्स में इन्हें 'लेडेन प्लेट्स' और भारत में 'अनाइमंगलम कॉपर प्लेट्स' के नाम से जाना जाता है। लगभग 30 किलोग्राम वजनी इन 21 तांबे की प्लेटों को एक विशाल कांसे की अंगूठी (ब्रॉन्ज रिंग) से आपस में जोड़ा गया है, जिस पर चोल साम्राज्य की आधिकारिक शाही मुहर लगी है। भारतीय सीमाओं से बाहर चोल राजवंश का यह अब तक का सबसे महत्वपूर्ण जीवित रिकॉर्ड माना जाता है।

इन शिलालेखों में प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था के धर्मनिरपेक्ष आदर्शों की एक अद्भुत झलक मिलती है। इनमें लिखे गए ग्रंथों को बहुत ही बारीकी से दो अलग-अलग हिस्सों में विभाजित किया गया है, जिसमें संस्कृत और तमिल दोनों भाषाओं में विवरण मौजूद हैं। ये ताम्रपत्र एक परम हिंदू सम्राट राजा राजा चोल प्रथम के शासनकाल की कहानी बयां करते हैं, जिन्होंने एक बौद्ध मठ को चलाने के लिए राजस्व बंदोबस्त (राजस्व अनुदान) को मंजूरी दी थी।

चोल इतिहास की शाही कहानी

इस स्थायी रिकॉर्ड के बनने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। राजा राजा चोल प्रथम ने शुरुआत में केवल एक मौखिक आदेश दिया था, जिसे सबसे पहले बेहद कमजोर और नाजुक ताड़ के पत्तों पर दर्ज किया गया था। लेकिन जब उनके पराक्रमी बेटे राजेंद्र चोल प्रथम ने सत्ता संभाली, तो उन्होंने पिता के इस मौखिक वादे को हमेशा के लिए अमर करने का फैसला किया। उन्होंने इस अनुदान के पूरे विवरण को मजबूत तांबे की प्लेटों पर उकेरने का आदेश दिया ताकि यह समय की मार को झेल सके। इन प्लेटों के यूरोप पहुंचने की कहानी 1700 के दशक में शुरू हुई थी। फ्लोरेंटियस कैंपर नाम का एक ईसाई मिशनरी इन्हें अपने साथ नीदरलैंड्स ले गया था। वह उस दौर में भारत में तैनात था जब नागापट्टिनम का तटीय शहर डच औपनिवेशिक नियंत्रण में था।