
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (फोटो - एएनआई)
CJI Surya Kant: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने 19 सितंबर को नई दिल्ली में ‘पर्यावरण और जलवायु की गतिशीलता का भविष्य’ विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पर्यावरण संरक्षण और न्यायपालिका की भूमिका पर विस्तार से बात की है। उन्होंने कहा कि प्रकृति की रक्षा भारत की पुरानी परंपरा का हिस्सा रही है। इसका असर संविधान में भी दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि संविधान सिर्फ राजनीतिक दस्तावेज नहीं है। यह पिछली, मौजूदा और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी को भी बताता है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारत में सभ्यता के शुरुआती दौर से ही प्रकृति के प्रति सम्मान रहा है।
मुख्य न्यायाधीश ने संविधान के अनुच्छेद 48ए का जिक्र किया। इसके तहत राज्य को पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार के लिए काम करने की जिम्मेदारी दी गई है। उन्होंने अनुच्छेद 51ए(जी) का भी उल्लेख किया। इसमें हर नागरिक से प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार की अपेक्षा की गई है।
उन्होंने कहा कि केवल संविधान में प्रावधान होना ही पर्याप्त नहीं है। इन प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए न्यायपालिका की भूमिका भी जरूरी है। अदालतों की व्याख्या के जरिए इन संवैधानिक प्रावधानों को लोगों के लिए वास्तविक सुरक्षा में बदला जा सकता है।
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने समय के साथ पर्यावरण से जुड़े कानूनों और अधिकारों को मजबूत किया है। अदालत ने स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा माना है।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण सिद्धांत भी विकसित किए हैं। इनमें सावधानी का सिद्धांत, प्रदूषण करने वाले की जिम्मेदारी, पूर्ण दायित्व और सार्वजनिक न्यास का सिद्धांत शामिल हैं।
इन सिद्धांतों के तहत पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वालों और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने पर जोर दिया गया है। साथ ही खराब हो चुके पर्यावरण को सुधारने और भविष्य में नुकसान रोकने की जिम्मेदारी भी तय की गई है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सतत विकास की अवधारणा को भी आगे बढ़ाया है। इसका मतलब विकास को पूरी तरह रोकना नहीं है। वहीं पर्यावरण की अनदेखी करके विकास की अनुमति देना भी उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन जरूरी है। प्रकृति की रक्षा सिर्फ किसी पर उपकार करना नहीं है। यह इंसानों के अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के जीवन से जुड़ा सवाल है।
सीजेआई ने कहा कि पर्यावरण से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने समय के साथ ऐसी न्याय व्यवस्था विकसित की है, जिसका उद्देश्य आर्थिक और बुनियादी ढांचे के विकास के साथ पर्यावरण की संवैधानिक सुरक्षा को भी बनाए रखना है।
Updated on:
19 Sept 2026 12:32 pm
Published on:
19 Sept 2026 12:31 pm
