
मरीज महिला (Representational Photo)
कल्पना कीजिए, एक मरीज पित्त की पथरी या लीवर की गंभीर बीमारी से जूझ रहा है। अस्पताल में भर्ती होने के बाद उसकी हालत बिगड़ती जाती है। डॉक्टर जल्दी इलाज के लिए एंटीबायोटिक देते हैं, लेकिन संक्रमण रुकने की बजाय और फैलता चला जाता है। एम्स जोधपुर, पीआईएलबीएस मोहाली और पीजीआई चंडीगढ़ के चिकित्सा एक्सपर्ट्स ने इस डरावनी स्थिति के बारे में बताया है। लैंसेट में प्रकाशित रिपोर्ट में उन्होंने कहा है कि लीवर और पित्त की गंभीर बीमारियों वाले मरीजों के लिए अब सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं (Common Antibiotics) अब काम नहीं कर रही हैं।
चिकित्सा एक्सपर्ट्स ने लीवर और पित्त का इलाज करवाने आए मरीजों में से 1,626 पर रिसर्च की। उनके सैंपलों की जांच की गई। इनमें से 240 खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए। यानी करीब 15% मामलों में एंटी माइक्रोबियल रेज़िस्टेंस यानी एएमआर की पुष्टि हुई। यानी इन पर सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं बेअसर रहीं। सबसे ज़्यादा चिंता की बात यह है कि कुछ मामलों में आखिरी विकल्प कही जाने वाली सबसे मज़बूत एंटीबायोटिक्स भी बेअसर होने लगी हैं।
क्लेबसिएला - यह बैक्टीरिया 48 मामलों में मिला। इसने एक शक्तिशाली एंटीबायोटिक कार्बापेनेम के लिए 96% रेज़िस्टेंस हासिल कर लिया है। बाकी सामान्य लेकिन मज़बूत एंटीबायोटिक्स जैसे तीसरी और चौथी पीढ़ी की सेफलोस्पोरिन सहित फ्लोरोक्विनोलोन और पाइपेरासिलिन टैजोबैक्टम के खिलाफ भी इसमें प्रतिरोधक क्षमता मिली।
ई. कोलाई - इस बैक्टीरिया के भी 40 मामले थे। यह कार्बापेनेम के प्रति 20% रेज़िस्टेंस पा चुका है।
स्टेफिलोकोकस ऑरियस - इस बैक्टीरिया के सभी नमूनों में मेथिसिलिन के लिए 100% रेज़िस्टेंस पाया गया। लेकिन यह एंटीबायोटिक इस बैक्टीरिया पर काम नहीं कर रही।
कैंडिडा फंगस : यह सबसे ज़्यादा 78 मामलों में मिला। खास तौर पर पेशाब और सांस की नली में। यह बताता है कि एंटीबायोटिक्स के ज़्यादा इस्तेमाल से फंगल संक्रमण भी बढ़ रहा है।
डॉक्टरों के अनुसार ऐसा इन मरीजों को पहले से दी जा रही ज़्यादा एंटी बैक्टीरियल दवाओं और अस्पतालों में भर्ती होने के कारण हुआ। अस्पताल में बार-बार भर्ती होने वाले लीवर के मरीजों को पहले से ही बहुत सारी ब्रॉड-स्पेक्ट्रम और रिज़र्व एंटीबायोटिक दी जा चुकी होती हैं। कई बार ईआरसीपी (पेट संबंधी समस्याओं में विशेष एंडोस्कोपी और एक्स रे प्रक्रिया), स्टेंटिंग और सर्जरी के कारण भी बैक्टीरिया और मज़बूत हो रहे हैं।
रिपोर्ट में डॉ. अनुराधा शर्मा, डॉ. महुया रॉय और टीम बताती है कि सिर्फ अनुभव के आधार पर एंटीबायोटिक देने से नुकसान हो रहा है। तुरंत एंटीमाइक्रोबियल स्टीवर्डशिप (एंटीबायोटिक्स का विवेकपूर्ण इस्तेमाल) को नहीं माना गया तो जल्द ही गंभीर मरीजों का इलाज बहुत मुश्किल हो जाएगा।
Updated on:
25 Jul 2026, 5:24 AM IST
Published on:
25 Jul 2026, 5:24 AM IST
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