
शांति देवी पाटकर अबला नारी थी, लेकिन अपराध की दुनिया में अपनी बादशाहत बनाए रखने के लिए उसने जिस्म देने और जान लेने से भी गुरेज नहीं किया था। (फोटो एआई से बना है)
मुंबई में एक चॉल में रहने वाली वो अबला नारी थी। पति के जुल्मों की शिकार। एक दिन पति ने उसे गाली देते हुए, खींच कर घर से बाहर कर दिया। उसके कपड़ों की गट्ठर सामने फेंक दी और चिल्लाया- मुझे अपना मुंह मत दिखाना। पति ने ज़ोर से दरवाजा बंद कर दिया, पत्नी देखती रह गई।
शांति देवी पाटकर ने अभी उम्र का दूसरा दशक भी पार नहीं किया था। उसके दो छोटे-छोटे बेटे थे। कहां जाए, क्या करे, क्या खाए? उसके दिमाग में इन सवालों की घंटी बज रही थी। उसने कपड़ों का गट्ठर उठाया, बच्चों की उंगली थामी और बढ़ चली।
वह वर्ली इलाके के सिद्धार्थ नगर चॉल पहुंच गई। उसे कहीं और जाने का सूझा नहीं, क्योंकि इसी चॉल में वह बड़ी हुई थी। शादी से पहले माता-पिता और पांच भाइयों के साथ वह यहीं रहा करती थी। उसने एक भाई का दरवाजा खटखटाया। वह भाई उस वक्त एक कत्ल के केस में जेल गया हुआ था। भाई की पत्नी ने दरवाजा खोला और दिल से उसे अपना लिया।
जल्द ही भाभी सुमिति ने शांति देवी को पास के घरों में कुछ काम दिलवा दिया। कुछ समय बाद वह तीन घरों में काम करके महीने के 600 रुपये कमाने लगी। अब उसने उसी चॉल में अलग कमरा ले लिया और बच्चों के साथ रहने लगी।
एक दिन शांति काम से घर लौट रही थी। रास्ते में उसे कमजोरी और थकान महसूस हुई। वह सुस्ताने के लिए एक बेंच पर बैठ गई। कुछ ही समय में वहां एक आदमी आ गया। वह ड्रग्स पहुंचाने का काम करता था। उसने 'बहन' कह कर शांति का भरोसा जीता और अपनी बातों से उसे भी इस काम के लिए राजी करा लिया। उसके मन में जो भी शक-सवाल थे, उस शख्स ने सब का जवाब दे दिया और कहा कि वह एक महीने में दस हजार रुपये तक कमा सकती है। अंत में शांति बोली- मैं कल इसी समय, इसी जगह तुम्हें मिलती हूं और अपना फैसला सुनाती हूं।
शांति देवी के दिमाग में दस हजार और उस शख्स की कही बातें घूमती रहीं। वह पूरी रात सो नहीं सकी। अंत में उसने फैसला ले लिया था। अगली शाम उसने उस शख्स को अपना फैसला सुना दिया- मैं तैयार हूं, बताओ क्या करना होगा।
शांति देवी को शहर के पांच सितारा होटलों में ब्राउन शुगर और हशीश पहुंचाने का काम दिया गया। दो साल में उसने इतने पैसे कमा लिए कि चॉल में अपना कमरा खरीद लिया और बच्चों को अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़ाने लगी।
तब तक शांति देवी ड्रग्स के कारोबार की कई बारीकियां सीख गई थी। अब वह अपना खुद का कारोबार करने लगी। वह ड्रग्स लेती और टैक्सी में रख कर अपने चॉल में आती थी। टैक्सी कमरे तक नहीं जा पाती थी तो उसने कुछ लड़के रख लिए थे जो टैक्सी से उसके कमरे तक ड्रग्स पहुंचाया करते थे। उसने करीब 20 लड़के रख लिए थे। सब के सब नशेड़ी। वह उन्हें नशा करने के लिए ड्रग्स देती रहती और उनसे काम लेते रहती। उनके जरिए लोगों को ड्रग्स भिजवाती। एक-दो साल के अंदर वे लड़के मर जाया करते थे। शांति देवी नए लड़के रखते जाती थी।
करीब दस साल शांति देवी का कारोबार ऐसे ही चलता रहा। 1992 की एक दोपहर की बात है। वह अपनी चॉल में थी। तभी किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी। दरवाजा खोला तो देखा सामने एक सिपाही था। पहली बार उसका सामना पुलिस से हो रहा था। कई किलो ड्रग्स और रुपयों का ढेर कमरे में पड़ा था। पैसे इतने थे कि एक साल से गिने नहीं गए थे।
सिपाही बोला- कमरे की तलाशी लेनी है। शांति देवी के होश उड़ गए। उसने तुरंत रंग बदला और सिपाही को अपने जाल में फंसा लिया। सिपाही को अपना शरीर सौंप कर मुसीबत से जान छुड़ाई। सिपाही अजय लोखंडे के जाते ही शांति देवी ने ड्रग्स रखने के लिए चॉल में एक कमरा खरीदा।
सिपाही हर हफ्ते उसके पास आने लगा। धीरे-धीरे दोनों में प्यार हो गया और एक दिन दोनों एक-दूसरे के पार्टनर बन गए। अब तो कभी-कभी पुलिस की जीप में ही ड्रग्स ले जाया जाने लगा। बदले में लोखंडे को भी भरपूर कमीशन मिलने लगा।
शांति के पास पैसा इतना आ रहा था कि संभालना मुश्किल हो रहा था। इसको संभालने के मकसद से टैक्सी बिजनेस शुरू किया गया और परिजनों के नाम पर 29 बैंक खाते खोले गए। इन खातों में ड्रग्स से कमाए पैसे जमा होने लगे। लेकिन, पैसा इतना आ रहा था कि इतने खाते भी कम पड़ रहे थे। सो, अब वह सोना खरीदने लगी और जब सोना भी भरपूर हो गया तब रियल एस्टेट में पैसे लगाने लगी।
मार्च 2001 में शांति देवी 30 ग्राम हशीश के साथ पकड़ी गई। जमानत लेने में आठ महीने लग गए। तब तक धंधे का काफी नुकसान हो चुका था। मुनाफा 80 फीसदी तक कम हो गया था। कई नए धंधेबाज अपना जाल फैला चुके थे।
शांति देवी ने लोखंडे को बुलाया और उससे मदद मांगी। उसने पुलिस की मुखबिर बन जाने की सलाह दी और कहा- मैं पुलिस को इसके लिए राजी कर लूंगा। तुम पुलिस को अपने विरोधियों के बारे में जानकारी दो। पुलिस उन्हें पकड़ेगी और तुम्हारा काम हो जाएगा। कुछ ही साल में सच में उसका काम हो गया।
शांति देवी एक बार फिर अपने इलाके में ड्रग्स के धंधे की रानी हो चुकी थी। तब तक उसके बेटे भी इस कारोबार में साथ हो गए थे। बेटों और भाइयों के साथ मिल कर शांति ने न केवल अपना धंधा, बल्कि रुतबा भी काफी बढ़ा लिया था। अब वह स्थानीय नेताओं को चुनाव लड़ने के लिए पैसे देने लगी थी। उनमें से कुछ चुनाव जीत भी गए। चुनाव जीतने के बाद वे उसका शुक्रिया कहने आते और जिस अदब से बात करते, वह शांति देवी के लिए एक अलग और नया अनुभव था। उसे समझ में आ गया कि चुनाव में नेताओं पर पैसा लगाना अच्छा विकल्प है।
लेकिन, कुछ महीने बाद शांतिदेवी के लिए एक नई चुनौती खड़ी हो गई। चॉल में उसकी एक पड़ोसन आशा कशिकर ने भी ड्रग्स का धंधा शुरू कर दिया। एक सुबह शांति उसके घर पहुंच गई और सीधा कहा- यह सब बंद कर दो। आशा ने भी टका-सा जवाब दिया- तुम होती कौन हो मुझे रोकने वाली? उस समय तो शांति देवी लौट गई, लेकिन रात को उसने खौफनाक कदम उठाया। अपने भाई से कह कर आशा के कमरे को बाहर से बंद करवा कर आग लगवा दी। ड्रग्स समेत आशा खाक हो गई। लोखंडे ने यहां भी शांति का साथ दिया।
2012 में शांति देवी के गुर्गों ने खबर दी कि बाजार में कुछ नया आया है, जिसे 'मियो-मियो' कहते हैं। यह कोकीन जैसा असर करता है, लेकिन कीमत में उससे 20 गुना कम है। सबसे बड़ी खुशखबरी यह थी कि उसे रखना गैरकानूनी नहीं था।
लोखंडे की मदद से शांति देवी 'मियो-मियो' के सप्लायर की तलाश में लग गई। उसने गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश में कई फैक्ट्री मालिकों को पैसे देकर अगले कई साल के लिए उनका स्टॉक बुक कर लिया। एक साल के भीतर मुंबई के 70 फीसदी नशेड़ी 'मियो-मियो' के दीवाने हो गए।
इस बीच शांति को पता चला कि लोखंडे किसी दूसरी महिला के प्यार में पड़ चुका है। उसने तुरंत अपना शातिर दिमाग चलाया और पुलिस को सूचना दे दी कि सतारा में लोखंडे के घर पर भारी मात्रा में ड्रग्स है। दो दिन बाद अखबार में लोखंडे की गिरफ्तारी की खबर आ गई। लेकिन, इस केस में शांति देवी को भी आरोपी बना दिया गया और वह एक बार फिर पुलिस की गिरफ्त में आ गई। कोर्ट में जब वकील फेल हो गया तो उसने अपना शातिर दिमाग चला कर जज से बेल ले ली।
शांति देवी ने दावा किया कि जो चीज बरामद हुई है, वह ड्रग्स है ही नहीं। इस पर जज ने प्रयोगशाला में जांच करवाने का आदेश दिया और इसी आधार पर रिपोर्ट आने तक शांति देवी को जमानत भी दे दी।
इसके बाद शांति देवी को सतारा के एसपी का फोन आया। पांच लाख रुपये में बात बनी। शांति देवी ने दोहरा गेम खेला और एसपी को रिश्वत लेने के आरोप में पकड़वा दिया।
उधर कोर्ट में जब जांच रिपोर्ट आई तो बताया गया कि पुलिस ने जो चीज बरामद की है, वह कोई ड्रग्स नहीं, बल्कि अजीनोमोटो निकला है। इस रिपोर्ट के आधार पर लोखंडे और शांति देवी को रिहा कर दिया गया।
(सुशांत सिंह और कुलप्रीत यादव की किताब 'क्वीन्स ऑफ क्राइम' (पेंगुइन प्रकाशन) में दर्ज कहानी पर आधारित।)
Updated on:
11 Apr 2026 03:20 pm
Published on:
11 Apr 2026 02:39 pm
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