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Digital Threat: बच्चों को बिगाड़ रहे मोबाइल, 73% स्कूली बच्चे देखते हैं अश्लील सामग्री, इन 7 बातों का रखें ध्यान

Digital Threat: वैसे तो सोशल मीडिया पर बच्चों के अकाउंट नहीं खोले जा सकते और न ही उनके नाम से मोबाइल कनेक्शन ही लिया जा सकता है, फिर भी अपने माता-पिता या अभिभावक के फोन और अकाउंट का वे धड़ल्ले से दुरुपयोग कर रहे हैं।

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-अरुण कुमार
Digital Threat:
बच्चों को सोशल मीडिया दूर रखने की कवायद फेल हो रही है। इसका दुष्परिणाम भी सामने आने लगा है। देश-दुनिया के कई अध्ययन बताते हैं कि पढ़ाई के दौरान बच्चे हर 20 मिनट में सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर जाते हैं। इस दौरान 13 से 17 साल तक के 73 फीसदी बच्चे जाने-अनजाने में आपत्तिजनक और अश्लील सामग्री देखते हैं और उनका स्कूल वर्क लेट हो जाता है। माता-पिता यदि गौर करें तो पाएंगे कि उनका बच्चा एक घंटे की बजाय तीन घंटे में स्कूल वर्क कर रहा है। इसकी वजह इंटरनेट पर उपलब्ध पोर्न सामग्री है। इसका दुष्प्रभाव ऐसा है कि पोर्न देखने के आदी बच्चे बलात्कार को सामान्य बात समझने लगते हैं।

वैसे तो सोशल मीडिया पर बच्चों के अकाउंट नहीं खोले जा सकते और न ही उनके नाम से मोबाइल कनेक्शन ही लिया जा सकता है, फिर भी अपने माता-पिता या अभिभावक के फोन और अकाउंट का वे धड़ल्ले से दुरुपयोग कर रहे हैं। स्कूल या घर पर पढ़ाई में इंटरनेट और सोशल मीडिया की बढ़ती भूमिका के कारण माता-पिता भी बच्चों को इसकी छूट देने के लिए बाध्य हैं। आस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन कर दिया है। ब्रिटेन समेत कई यूरोपीय देशों में बच्चों को सप्ताह में एक बार यौन शिक्षा के साथ सोशल मीडिया की बुरी चीजों से बचाव के बारे में बताया जाता है।

इंस्टीट्यूट ऑफ गवर्नेंस पॉलिसीज एंड पॉलिटिक्स ने सोशल मीडिया मैटर्स एंड यूथ ऑनलाइन लर्निंग ऑर्गनाइजेशन के साथ भारतीय बच्चों में इंटरनेट के उपयोग पैटर्न पर अध्ययन किया। अध्ययन के अनुसार देश के 80 फीसदी नाबालिगों ने हर दिन औसतन दो घंटे सोशल मीडिया का उपयोग किया। इनमें 30 फीसदी ने इस दौरान ऑनलाइन संवेदनशील जानकारी दोस्तों से साझा की और 15 फीसदी ने ऑनलाइन पोर्नोग्राफी देखने की बात मानी। 40 फीसदी ने उन लोगों से परिचित होने की बात कही जिन्होंने इंटरनेट पर पोर्नोग्राफिक कंटेंट देखी है। सवेक्षण में सबसे ज्यादा प्रतिक्रियाएं महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और राजस्थान से आईं। कोरोना काल (जुलाई 2020) से शुरू यह सर्वेक्षण हर साल अलग-अलग संस्थाओं के साथ मिलकर किया जाता है।

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बन रहे हैं मानसिक रोगी

यूनिवर्सिटी ऑफ मिडलसेक्स, लंदन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि बच्चे एक बार पॉर्न देखने के बाद बार-बार उसे खोजते हैं। भारत में ऐसे बच्चों की उम्र 12 से 16 साल है। पोर्नोग्राफी के असर के चलते बच्चे महिलाओं को सेक्स की वस्तु समझने लगते हैं। उन्हें लगता है कि बलात्कार सामान्य यौन प्रक्रिया है। ये बच्चे कम उम्र में ही यौन संबंध बनाने का प्रयास करते हैं और विफल होने पर नशे का शिकार हो जाते हैं।

पोर्नोग्राफी से बढ़े अपराध

पोर्न साइटों पर प्रतिबंध के लिए अभियान चला रहे बेंगलूरु के गैर सरकारी संगठन रेस्क्यू के अनुसार मेट्रो शहरों में 10 वर्ष की आयु के बच्चे भी पोर्न देखते हैं। एनजीओ ने 10 कॉलेजों के 400 छात्रों पर सर्वेक्षण के आधार पर बताया कि हिंसक पोर्नोग्राफी देखने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है। इसमें कॉलेज के छात्र-छात्राओं की संख्या में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। पोर्नोग्राफी युवाओं को यौन अपराधों की ओर ले जा रही है।

क्या कहता है देश का कानून

भारत में अकेले पोर्न कंटेंट देखना अपराध नहीं है लेकिन पोर्नोग्राफी गैरकानूनी है। इसे महिला, पत्नी या दोस्त को दिखाना अवैध है। मूवी, फोटो, लिंक शेयर करना या ग्रुप में देखना अवैध है। चाइल्ड पोर्नोग्राफी में पोक्सो एक्ट के तहत सजा का प्रावधान है। हालांकि सामान्य मामले में पांच साल की सजा या 10 लाख के जुर्माने का प्रावधान है।

बच्चों के व्यवहार पर नजर रखें

-स्कूलों में यौन शिक्षा अनिवार्य हो और बच्चों-युवाओं से खुलकर बात हो।
-बच्चों के मोबाइल पर कोई भी सोशल मीडिया अकाउंट एक्टिव न करें।
-स्कूल में लड़के-लड़कियों को लेकर बच्चे के व्यवहार को टीचर से पूछें।
-बच्चे से दोस्ताना व्यवहार रखें और ब्राउजर हिस्ट्री भी चेक करते रहें।
-बिना बताए बच्चा मोबाइल न ले, संभव हो तो आपके सामने ही पढ़े।
-हर दिन बच्चे से स्कूल की पढ़ाई, दोस्तों और खेल-कूद के बारे में पूछें।
-गलती पर बच्चे को डांटें नहीं बल्कि बैठाकर प्यार से समझाएं।