30 अक्टूबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

विकास की वेदी पर सिमटते जंगल, 10 वर्षों में 1.76 लाख हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट

India forest area: वन भूमि का डायवर्जन चार राज्यों में सबसे ज्यादा रहा। मध्य प्रदेश, ओडिशा, गुजरात और अरुणाचल प्रदेश ने कुल डायवर्जन का 52 फीसदी हिस्सा दिया।
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

भारत

•

image

Satya Brat Tripathi

•

Updated: 7 Jun 2026, 5:20 AM IST

Forest diversion India development impact.

File Photo- IANS

forest land diversion India: भारत में वन भूमि का गैर-वन कार्यों के लिए उपयोग चिंताजनक तस्वीर पेश कर रहा है। सरकार खुद कबूल कर रही है कि विविध कारणों से वर्ष 2015-16 से 2024-25 के बीच कुल 1.76 लाख हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन गतिविधियों के लिए डायवर्ट किया गया है। डायवर्जन संबंधी आंकड़े केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने संसद में पेश किए हैं। दीगर बात यह है कि इसमें से लगभग आधी यानी 97,050 हेक्टेयर जमीन सिर्फ पिछले पांच वर्षों (2020-21 से 2024-25) में बदली गई है। यह आंकड़ा 2015-20 की तुलना में करीब 23 फीसदी अधिक है।

एमपी व गुजरात आगे

वन भूमि के इस बड़े पैमाने पर डायवर्जन में चार राज्यों में सबसे ज्यादा रहा। मध्य प्रदेश, ओडिशा, गुजरात और अरुणाचल प्रदेश ने मिलकर कुल डायवर्जन का 52 फीसदी हिस्सा दिया। अकेले मध्य प्रदेश में 24,347 हेक्टेयर जमीन गैर-वन कार्यों के लिए दी गई, जो कुल का लगभग 25 प्रतिशत है। ओडिशा ने 12,876 हेक्टेयर (13 प्रतिशत), अरुणाचल प्रदेश ने 6,657 हेक्टेयर (7 प्रतिशत) और गुजरात ने 6,850 हेक्टेयर (7 प्रतिशत) वन भूमि डायवर्ट की। राजस्थान में 4331 हेक्टेयर भूमि डायवर्ट की गई।

निर्माण व ऊर्जा कार्यों में हुआ डायवर्जन

डायवर्जन का सबसे बड़ा हिस्सा सड़क निर्माण, खनन, जलविद्युत और सिंचाई परियोजनाओं तथा बिजली ट्रांसमिशन लाइनों के लिए हुआ। इन परियोजनाओं में कुल 72,440 हेक्टेयर जमीन लगी, जो पिछले पांच वर्षों में डायवर्ट की गई कुल वन भूमि का 75 प्रतिशत है। सड़क निर्माण के लिए 22,233 हेक्टेयर, खनन के लिए 18,913 हेक्टेयर, जलविद्युत और सिंचाई परियोजनाओं के लिए 17,434 हेक्टेयर तथा बिजली ट्रांसमिशन लाइनों के लिए 13,859 हेक्टेयर जमीन का उपयोग किया गया।

जंगलों का अस्तित्व व जैव विविधता पर संकट

डाउन टू अर्थ के विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का लगातार डायवर्जन जंगलों के अस्तित्व और जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा है। मंत्रालय के अनुसार, 18 राज्यों में कुल वन भूमि डायवर्जन का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सिर्फ पिछले पांच वर्षों में हुआ है। इससे साफ है कि विकास परियोजनाओं के दबाव में जंगल तेजी से सिमट रहे हैं।

वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के तहत गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए भूमि परिवर्तन की मंजूरी दी जाती है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि मंजूरी की दर लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यही रफ्तार जारी रही तो आने वाले वर्षों में वन क्षेत्र और जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ेगा।