
गोवा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज (Photo: IANS)
Goa Assembly Election 2027: गोवा में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। बीजेपी और उसकी सहयोगी महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (MGP) के बीच सीट बंटवारे को लेकर खींचतान चल रही है। राज्य की मांद्रेम विधानसभा सीट को लेकर दोनों दलों के बीच विवाद की स्थिति बनती दिख रही है। बताया जा रहा है कि इस सीट पर पूर्व सीएम लक्ष्मीकांत पारसेकर और दयानंद सोप्ते ने हाथ मिला लिया है। दोनों नेताओं का मकसद एमजीपी विधायक जीत आरोलकर को चुनाव में हराकर दोबारा से सीट पर कब्जा हासिल करना है।
बता दें कि मांद्रेम उत्तरी गोवा का तटीय विधानसभा क्षेत्र है। इस सीट से तीन बार पूर्व सीएम लक्ष्मीकांत पारसेकर विधायक रह चुके हैं। साल 2022 में बीजेपी ने उनकी जगह दयानंद सोप्ते को प्रत्याशी बनाया था। टिकट नहीं मिलने से पारसेकर नाराज हो गए और पार्टी छोड़ दी। इसके बाद निर्दलीय चुनाव लड़ा और हार का सामना करना पड़ा। 2022 में MGP के जीत आरोलकर ने चुनाव जीता था।
हालांकि अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हुई नजर आ रही है। MGP को चुनौती देने के लिए पारसेकर और सोप्ते एक साथ आ गए हैं। इससे BJP के सामने अपने सहयोगी दल MGP के साथ सीट बंटवारे का सवाल खड़ा हो गया है। पारसेकर ने इस मुद्दे पर कहा कि मैं फैसला पार्टी पर छोड़ता हूं।
MGP विधायक जीत आरोलकर ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी BJP के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। ऐसे में BJP नेताओं से अपेक्षा है कि वे गठबंधन के उम्मीदवार के समर्थन में काम करेंगे।
वहीं MGP नेता सुदिन धवलीकर ने मांद्रेम सीट को लेकर किसी तत्काल टकराव से इनकार किया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने एक सर्वे कराया है, जिसमें तीन सीटों पर MGP की मजबूत स्थिति सामने आई है। इनमें धवलीकर की अपनी सीट मारकाइम, BJP के विधायक प्रवीण प्रभाकर अरलेकर की सीट पेरनेम और निर्दलीय विधायक डॉ. चंद्रकांत शेट्ये की सीट बिचोलिम शामिल हैं। हालांकि धवलीकर ने मांद्रेम सीट का नाम नहीं लिया था। उन्होंने कहा कि सीट बंटवारे को लेकर अभी कोई अंतिम दावा नहीं किया गया है।
बता दें कि गोवा की राजनीति में MGP की अहम भूमिका रही है। गोवा को 1963 में MGP ने पहला मुख्यमंत्री दिया था। 1960 और 1970 के दशक में पार्टी का प्रभाव बना रहा, लेकिन बाद में कांग्रेस ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया।
अपना राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने के लिए MGP ने 1990 के दशक की शुरुआत में BJP के साथ गठबंधन किया था। उस समय MGP गठबंधन में वरिष्ठ सहयोगी थी। वर्ष 1994 के विधानसभा चुनाव में BJP ने पहली बार चार सीटें जीती थीं। इस सफलता में MGP के पारंपरिक मतदाता आधार की भी भूमिका मानी जाती है।
हालांकि, 1999 तक दोनों दलों के बीच राजनीतिक समीकरण बदल गए। सीटों के बंटवारे पर सहमति नहीं बनने के कारण दोनों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। इस चुनाव में BJP की सीटें चार से बढ़कर 10 हो गईं, जबकि MGP चार सीटों पर सिमट गई।
इसके बाद MGP का राजनीतिक प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा, लेकिन पार्टी राज्य में बनने वाली अलग-अलग सरकारों के गठबंधनों का हिस्सा बनी रही। वर्ष 2000 से 2005 के बीच वह BJP के साथ, 2007 से 2012 के बीच कांग्रेस के साथ और उसके बाद फिर BJP के साथ रही।
वर्ष 2012 में दोनों दलों ने चुनाव से पहले गठबंधन किया था। इसके बाद 2019 के उपचुनावों में MGP ने सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद BJP के खिलाफ उम्मीदवार उतारे थे।
मांद्रेम सीट को लेकर चल रही बयानबाजी के बीच मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने MGP को उसकी राजनीतिक ताकत का ध्यान रखने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि MGP को अपनी सीमाएं समझनी चाहिए।
एक स्थानीय टेलीविजन चैनल से बातचीत में सावंत ने कहा कि MGP वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में BJP के साथ नहीं थी और उसने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। उनके मुताबिक, उस चुनाव में MGP केवल दो सीटें जीत सकी थी। सावंत ने कहा कि पार्टी को अनावश्यक सर्वे करने के बजाय BJP के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने पर ध्यान देना चाहिए।
सावंत के इस बयान पर धवलीकर ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि MGP के पास प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 3,000 वोट हैं।
Updated on:
20 Oct 2026 03:24 pm
Published on:
20 Oct 2026 03:03 pm
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