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क्या PM के भाषण के बिना अधूरा है संसद सत्र? जानें संविधान के वो नियम जो मोदी को देते हैं ‘खास’ पावर

संसदीय नियम और महत्व: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 87 के तहत, राष्ट्रपति हर साल के पहले सत्र और नई लोकसभा के गठन के बाद दोनों सदनों को संबोधित करते हैं। इस संबोधन के बाद संसद में 'धन्यवाद प्रस्ताव' लाया जाता है, जिस पर प्रधानमंत्री चर्चा का जवाब देते हैं। यह भाषण सरकार की नीतियों और भविष्य के रोडमैप का आईना होता है।

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pm modi

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Importance of PM Motion of Thanks Speech: संसद के बजट सत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बिना पारित हो गया। विपक्ष के हंगामे के कारण 4 फरवरी को पीएम का प्रस्तावित जवाब नहीं हो सका और सदन को स्थगित करना पड़ा। अंत में स्पीकर ओम बिरला ने वॉयस वोट से प्रस्ताव पारित कर दिया। यह घटना 2004 के बाद पहली बार हुई है जब धन्यवाद प्रस्ताव बिना पीएम के जवाब के पास हुआ। सवाल उठ रहा है कि क्या संसद सत्र पीएम के भाषण के बिना चल सकता है? आइए जानते हैं संविधान के नियम और पीएम की 'खास' पावर।

राष्ट्रपति का अभिभाषण: संविधान का अनुच्छेद 87

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 87 के अनुसार, हर साल संसद के पहले सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होती है। नए लोकसभा गठन के बाद पहला सत्र और प्रत्येक वर्ष का पहला सत्र राष्ट्रपति के संबोधन से शुरू होता है। राष्ट्रपति दोनों सदनों को संयुक्त रूप से संबोधित करते हैं और सरकार की नीतियों, योजनाओं और एजेंडे को बताते हैं। यह अभिभाषण सरकार द्वारा तैयार किया जाता है, लेकिन राष्ट्रपति इसे पढ़ते हैं। यह सरकार की आधिकारिक नीति का दस्तावेज माना जाता है।

धन्यवाद प्रस्ताव: जवाबदेही का मंच

राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद धन्यवाद प्रस्ताव लाया जाता है। इस प्रस्ताव पर बहस होती है, जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष सरकार की नीतियों पर चर्चा करते हैं। विपक्ष आलोचना करता है, सवाल उठाता है और सरकार से जवाब मांगता है। यह संसद में सरकार की जवाबदेही का महत्वपूर्ण मंच है। धन्यवाद प्रस्ताव पारित होने के बाद ही संसद की अन्य कार्यवाही आगे बढ़ती है।

पीएम का जवाब: संवैधानिक अनिवार्यता या परंपरा?

संविधान में कहीं भी यह अनिवार्य नहीं लिखा है कि धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री को ही अंतिम जवाब देना होगा। कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है कि पीएम का संबोधन अनिवार्य है। संसद की कार्यवाही राष्ट्रपति के अभिभाषण, धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा और उसके पारित होने से पूरी मानी जाती है। यदि पीएम जवाब नहीं देते, तब भी प्रस्ताव पारित हो सकता है, जैसा कि इस बार हुआ।

हालांकि, संसदीय परंपरा में पीएम का जवाब बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह सरकार का आधिकारिक और निर्णायक पक्ष होता है। पीएम का जवाब न आना विपक्ष के लिए सरकार से बचने का मौका बन जाता है। राजनीतिक रूप से यह असामान्य और विवादास्पद माना जाता है, क्योंकि इससे सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठते हैं।

पीएम को 'खास' पावर क्यों?

प्रधानमंत्री के पास संसद में बहस का अंतिम जवाब देने की परंपरा है, जो उन्हें सरकार का चेहरा बनाती है। यह उनकी नेतृत्व क्षमता और नीतियों का बचाव करने का अवसर होता है। संविधान पीएम को अनुच्छेद 75 के तहत मंत्रिपरिषद का प्रमुख बनाता है, जो राष्ट्रपति को सलाह देता है। पीएम का जवाब सरकार की मजबूती दिखाता है।