
India invites major US nuclear firms to invest in India’s expanding civil nuclear sector. (File Photo- IANS)
India Nuclear Sector: भारत सरकार अपने सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम को नई रफ्तार देने की तैयारी में है। सरकार एक तरफ घरेलू प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR) टेक्नोलॉजी को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दे रही है, वहीं दूसरी तरफ छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) सेक्टर में विदेशी निवेश और तकनीकी साझेदारी को भी बढ़ाने की कोशिश कर रही है। हाल ही में पारित SHANTI एक्ट 2025 के बाद भारत का न्यूक्लियर सेक्टर पहली बार बड़े पैमाने पर प्राइवेट कंपनियों और विदेशी पूंजी के लिए खुलता दिखाई दे रहा है।
भारत की न्यूक्लियर रणनीति का मुख्य आधार PHWR टेक्नोलॉजी है, जिसमें देश ने दशकों में महारत हासिल की है। 220 MWe से लेकर नए 700 MWe रिएक्टर तक भारत का ऑपरेशनल रिकॉर्ड काफी मजबूत माना जाता है। सरकार का मानना है कि PHWR प्रोजेक्ट्स की लागत लाइट वॉटर रिएक्टर (LWR) की तुलना में कम रहती है, जिससे बिजली की प्रति यूनिट कीमत भी नियंत्रित रहती है। यही वजह है कि नीति निर्माता भविष्य में भी PHWR को ही भारतीय न्यूक्लियर सेक्टर की रीढ़ बनाए रखना चाहते हैं।
अमेरिका, रूस और फ्रांस जैसे देशों की कंपनियां LWR टेक्नोलॉजी में अग्रणी हैं, लेकिन भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन प्रोजेक्ट्स की भारी लागत है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, ज्यादा कैपिटल खर्च का सीधा असर बिजली टैरिफ पर पड़ता है। महाराष्ट्र के जैतापुर न्यूक्लियर प्रोजेक्ट का उदाहरण सामने रखा जा रहा है, जहां ऊंचे टैरिफ और लायबिलिटी विवादों के कारण प्रोजेक्ट लंबे समय से अटका हुआ है।
भारत अब छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर यानी SMR सेक्टर में वैश्विक कंपनियों और निवेशकों के साथ साझेदारी बढ़ाना चाहता है। अमेरिकी न्यूक्लियर डेलीगेशन से हुई बैठकों में भारत ने साफ किया कि SMR टेक्नोलॉजी, फंडिंग और मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू चेन में विदेशी भागीदारी का स्वागत किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में न्यूक्लियर ऊर्जा को व्यावसायिक रूप से प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में SMRs की बड़ी भूमिका होगी।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम एशिया के सॉवरेन फंड्स समेत कई विदेशी निवेशकों ने भारत के न्यूक्लियर विस्तार कार्यक्रम में शुरुआती रुचि दिखाई है। सरकार का फोकस सिर्फ तकनीक हासिल करने पर नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर पूंजी जुटाने पर भी है।
पिछले 15 महीनों में कई अमेरिकी न्यूक्लियर कंपनियों को अपनी सरकार से '10CFR810' रेगुलेशन के तहत विशेष अनुमति मिली है। इसके तहत वे कुछ शर्तों के साथ भारतीय संस्थाओं को न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर कर सकती हैं। इसी सिलसिले में अमेरिका का हाई-लेवल न्यूक्लियर डेलीगेशन भारत दौरे पर है, जिसने केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की।
मुंबई में अमेरिकी डेलीगेशन की बैठकें देश की प्रमुख निजी कंपनियों के साथ हो रही हैं। इनमें रिलायंस इंडस्ट्रीज, अडानी ग्रुप, टाटा पावर, जेएसडब्लूय एनर्जी, वेदांता, लार्सन एंड टर्बो और हिंडालको इंटस्ट्रीज जैसी कंपनिया शामिल हैं।
दिसंबर 2025 में संसद द्वारा पारित 'SHANTI' एक्ट ने भारत के न्यूक्लियर सेक्टर में ऐतिहासिक बदलाव किया। पहली बार प्राइवेट कंपनियों को न्यूक्लियर ऑपरेशन और फ्यूल मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में एंट्री का रास्ता मिला है। हालांकि विपक्ष ने एक्ट में लायबिलिटी सिस्टम में बदलाव और निजी भागीदारी को लेकर सवाल उठाए थे। हालांकि इस संबंध में सरकार का कहना है कि इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और देश की बेस-लोड बिजली क्षमता तेजी से बढ़ेगी।
Published on:
21 May 2026 10:29 am
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