
India to build 'digital fortress' in space (Representational Photo)
भारत अब डेटा प्रोसेसिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की वैश्विक दौड़ में ज़मीन की सीमाओं को लांघकर अंतरिक्ष में अपना 'डिजिटल किला' बनाने जा रहा है। इंडिया एआई इंपैक्ट समिट में बुधवार को प्रमुख एआई क्लाउड कंपनी नीवक्लाउड और स्पेस-टेक स्टार्टअप अग्निकुल कॉस्मोस ने मिलकर भारत का पहला 'एआई डेटा सेंटर इन स्पेस' लॉन्च करने की घोषणा की और इस मिशन को सबसे क्रांतिकारी तकनीक बताया। ज़मीन पर डेटा सेंटर बनाने के लिए महंगी ज़मीन और सर्वर को ठंडा रखने के लिए भारी कूलिंग खर्च की ज़रूरत होती है। अंतरिक्ष में प्राकृतिक ठंडक होने से यह खर्च बच जाएगा, जिससे कंप्यूटिंग सस्ती होगी।
अक्सर रॉकेट का ऊपरी हिस्सा सैटेलाइट छोडऩे के बाद अंतरिक्ष में कचरा बनकर रह जाता है। चेन्नई का स्टार्टअप अग्निकुल इसी हिस्से को एक 'होस्टिंग प्लेटफॉर्म' में बदल देगा। इसमें नीवक्लाउड के हाई-परमॉर्मेंस सर्वर और एआई सिस्टम तैनात होंगे, जो सौर ऊर्जा से चलेंगे। यानी जो हिस्सा बेकार हो जाता था, वह अब देश की मूल्यवान डिजिटल संपत्ति बनेगा। कंपनी का दावा है कि यह मॉडल पूंजीगत व्यय को काफी कम कर देगा। यह भारत को 255 बिलियन डॉलर के ग्लोबल एआई मार्केट में मज़बूत बनाएगा और 'डेटा संप्रभुता' सुनिश्चित करेगा।
भारत के इस मिशन को एलन मस्क के स्टारलिंक के मुकाबले देखा जा रहा है, लेकिन दोनों में बुनियादी फर्क है। स्टारलिंक अंतरिक्ष से इंटरनेट कनेक्टिविटी देता है, जबकि भारत का यह प्रोजेक्ट सीधे कंप्यूटिंग पावर मुहैया कराएगा। अब डेटा को प्रोसेस होने के लिए पृथ्वी पर सर्वर रूम में वापस नहीं आना पड़ेगा। यह काम अंतरिक्ष में ही प्रोसेस होकर मिली-सेकंड में नतीजा सीधे यूज़र तक पहुंचा देगा। नीवक्लाउड के संस्थापक नरेंद्र सेन के अनुसार दुनिया की 80% आबादी डेटा सेंटर से दूर होने के कारण 200 मिलीसेकंड की देरी का सामना करती है। सामान्य इंटरनेट में यह महसूस नहीं होता, लेकिन डिफेंस, ड्रोन और सेल्फ-ड्राइविंग कारों के लिए यह घातक हो सकती है। अंतरिक्ष में स्थित यह डेटा सेंटर इस 'लेटेंसी गैप' को खत्म कर देगा।
इस तकनीक से पांच क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव आएगा। इसमें रक्षा और सीमा सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा, खेती-ग्रामीण विकास, ऑटोमेशन और हेल्थकेयर शामिल हैं।
पायलट प्रोजेक्ट 2026 के अंत तक प्रस्तावित है। सफलता मिलने पर अगले तीन वर्षों में पृथ्वी की निचली कक्षा में 600 से ज़्यादा डेटा सेंटर का जाल बिछाया जाएगा।
इस मिशन के सामने अंतरिक्ष का रेडिएशन, पावर मैनेजमेंट और 'ज़ीरो मेंटेनेंस' जैसी कठिन चुनौतियाँ हैं। अंतरिक्ष में रिपेयरिंग संभव नहीं है। तेज़ घूमते सर्वर और ज़मीन के बीच रियल-टाइम संपर्क साधना एक बड़ी तकनीकी परीक्षा होगी।
Updated on:
19 Feb 2026 06:29 am
Published on:
19 Feb 2026 06:22 am
