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ISRO Privatization: ISRO के निजीकरण पर मचा घमासान! कर्मचारियों ने चेयरमैन से पूछे तीखे सवाल, भविष्य को लेकर बढ़ी चिंता

ISRO Employees News: निजी कंपनियों को अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ावा देने की नीति के बीच ISRO के कर्मचारी संगठनों ने सरकार से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। SSLV से शुरू हुई बदलाव की प्रक्रिया अब PSLV और LVM3 तक पहुंचने की चर्चाओं के बीच कर्मचारी संगठन कई अहम सवाल उठा रहे हैं।
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भारत

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Manoj Vashisth

Sep 06, 2026

ISRO Privatization

ISRO Privatization: ISRO कर्मचारियों की बढ़ी टेंशन! अगर रॉकेट-सेटेलाइट निर्माण हुआ निजी, तो हजारों नौकरियों पर क्या होगा? (फोटो सोर्स: @ians_india)

ISRO Privatization Latest News 2026: भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की रीढ़ माने जाने वाले ISRO में अब निजी भागीदारी को लेकर कर्मचारियों के बीच बेचैनी बढ़ती दिख रही है। अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका को लेकर नौ कर्मचारी संगठनों ने सीधे ISRO चेयरमैन और अंतरिक्ष विभाग के सचिव वी. नारायणन से जवाब मांगा है। सवाल सिर्फ रॉकेट बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी है कि आने वाले वर्षों में ISRO की अपनी भूमिका क्या होगी और हजारों कर्मचारियों के भविष्य पर इसका क्या असर पड़ेगा।

छह साल बाद उठे बड़े सवाल

भारत ने वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया था। इसके बाद निजी उद्योग को तकनीक हस्तांतरण, उपग्रह निर्माण, लॉन्च सेवाओं और अन्य गतिविधियों में अवसर मिलने लगे। लेकिन अब ISRO के भीतर से यह सवाल सामने आया है कि निजी भागीदारी की सीमा आखिर कहां तक होगी।

4 सितंबर को नौ कर्मचारी संगठनों ने ISRO चेयरमैन एवं अंतरिक्ष विभाग के सचिव वी. नारायणन को पत्र भेजकर सरकार की नीति स्पष्ट करने की मांग की। इनमें विभिन्न ISRO केंद्रों से जुड़े कर्मचारी संगठन शामिल हैं।

विवाद तब तेज हुआ जब IN-SPACe के चेयरमैन पवन कुमार गोयनका ने एक कार्यक्रम में कहा कि भविष्य में लॉन्च व्हीकल निर्माण का काम निजी क्षेत्र या सार्वजनिक उपक्रमों के हाथ में जा सकता है। कर्मचारी संगठनों के अनुसार, SSLV के मामले में यह बदलाव शुरू हो चुका है और आगे PSLV तथा LVM3 तक भी इसका विस्तार संभव है।

सैटेलाइट की जरूरत बढ़ी, ISRO पर अकेले कितना बोझ?

श्रीहरिकोटा में पत्रकारों से बातचीत के दौरान डॉ. वी. नारायणन ने कहा कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था और पूरे स्पेस इकोसिस्टम को तेजी से विस्तार देना जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल ISRO देश की भविष्य की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता।

उनके मुताबिक, इस समय देश के पास करीब 56 उपग्रह हैं, जबकि भविष्य की जरूरत इससे कई गुना ज्यादा हो सकती है। देश को सैकड़ों उपग्रहों की आवश्यकता होगी, जिनका इस्तेमाल संचार, मौसम पूर्वानुमान, कृषि, आपदा प्रबंधन, नेविगेशन, रक्षा और विभिन्न नागरिक सेवाओं में किया जा सकता है।

यही वजह है कि केंद्र सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधारों की दिशा में कदम उठाए हैं। इन सुधारों का मकसद सिर्फ निजी कंपनियों को प्रवेश देना नहीं, बल्कि ऐसा व्यापक तंत्र तैयार करना है जिसमें डिजाइन, निर्माण, प्रक्षेपण और अंतरिक्ष आधारित सेवाओं में अलग-अलग संस्थाएं योगदान कर सकें।

120 तकनीकों के हस्तांतरण का भी जिक्र

कर्मचारी संगठनों ने लॉन्च व्हीकल उत्पादन को निजी क्षेत्र में देने की चर्चाओं के साथ उपग्रह निर्माण के नियमित कार्यों को ISRO से बाहर ले जाने और नए लॉन्च ढांचे में निजी कंपनियों की भागीदारी पर भी सवाल उठाया है। पत्र में ISRO की करीब 120 तकनीकों के निजी क्षेत्र को हस्तांतरण का उल्लेख किया गया है।

संगठनों की सबसे बड़ी चिंता रोजगार और संस्थागत विशेषज्ञता को लेकर है। उनका कहना है कि यदि डिजाइन से लेकर परीक्षण और लॉन्च तक की जिम्मेदारियां धीरे-धीरे बाहर चली गईं, तो ISRO में तकनीकी कार्यक्षेत्र, पदोन्नति, कौशल विकास और नई भर्तियों के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।

निजी क्षेत्र से विरोध नहीं, नीति पर स्पष्टता चाहिए

कर्मचारी संगठनों ने साफ किया है कि वे निजी कंपनियों की भागीदारी के खिलाफ नहीं हैं। उनकी आपत्ति इस बात को लेकर है कि निजीकरण और ISRO की मूल क्षमता के बीच स्पष्ट सीमा तय नहीं की गई है।

उन्होंने सरकार से पूछा है कि क्या पवन कुमार गोयनका के बयान को आधिकारिक नीति माना जाए? साथ ही यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि PSLV, LVM3, SSLV और भविष्य के लॉन्च व्हीकलों के डिजाइन, विकास, निर्माण, परीक्षण और प्रक्षेपण की अंतिम जिम्मेदारी ISRO के पास रहेगी या नहीं।

कुल मिलाकर मामला केवल कर्मचारियों की नौकरी का नहीं, बल्कि उस वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता का भी है जिसे ISRO ने दशकों में विकसित किया है। अब निगाहें अंतरिक्ष विभाग के आधिकारिक जवाब पर टिकी हैं।