
Supreme Court Social Media : सोशल मीडिया ट्रायल पर जस्टिस एजी मसीह (फोटो सोर्स:@barandbench)
Judiciary and Social Media: अदालत में जब तक कानून के दांव-पेंच और साक्ष्यों की तराजू पर सच और झूठ को तोला जाता है, उससे कहीं पहले सोशल मीडिया के 'लाइक', 'शेयर' और 'रीट्वीट' अपना अंतिम फैसला सुना चुके होते हैं। 6 घंटे लंबी चलने वाली अदालती सुनवाई में से महज 19 सेकंड की क्लिप काटकर उसे बिना किसी संदर्भ के इंटरनेट पर उछाल देना और फिर 'ट्रेंड्स' के आधार पर जनभावना भड़काना यह सिर्फ एक तकनीकी ट्रेंड नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था की साख पर सीधा हमला है।
सीएएन फाउंडेशन (CAN Foundation) द्वारा आयोजित '5वें जस्टिस एच.आर. खन्ना मेमोरियल नेशनल सिम्पोजियम' में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस ए.जी. मसीह ने डिजिटल मीडिया के इस खतरनाक पहलू पर बेहद तल्ख टिप्पणी की।
जस्टिस मसीह ने स्पष्ट किया कि संविधान और न्याय का दायरा किसी एल्गोरिदम या सोशल मीडिया के रुझानों का गुलाम नहीं हो सकता।
"इंसाफ को रीट्वीट के जरिए नहीं तोला जा सकता और न ही संवैधानिक नैतिकता को एल्गोरिदम के रुझानों से तय किया जा सकता है। यह अनुशासन केवल जजों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि वकीलों, कानून के छात्रों और इस तंत्र से जुड़े हर व्यक्ति का साझा कर्तव्य है।"
उन्होंने कहा कि इंटरनेट का माहौल ऐसा बना दिया गया है कि अदालत के फैसले से काफी पहले जनता की जूरी अपना आरोपी चुन लेती है। अदालत भले ही बाद में किसी को बरी कर दे, लेकिन वह व्यक्ति एक ऐसी दुनिया में वापस लौटता है जो उसे महीनों पहले ही 'दोषी' मान चुकी होती है।
सोशल मीडिया के एल्गोरिदम पर प्रहार करते हुए जस्टिस मसीह ने कहा कि इंटरनेट विचारशीलता के बजाय त्वरित प्रतिक्रिया, तर्क के बजाय भावना और संदेह के बजाय गुस्से को बढ़ावा देता है।
कट-पेस्ट का खेल: लंबी अदालती कार्रवाई से चंद सेकंड की क्लिप निकालकर उसका संदर्भ खत्म कर दिया जाता है।
भ्रामक कैप्शन: किसी असंबंधित व्यक्ति द्वारा लिखे गए कैप्शन से जज के केवल एक सवाल को अंतिम फैसला मान लिया जाता है।
डिजिटल दबाव: जजों के सामने लाखों स्क्रीन का एक अदृश्य दबाव (डिजिटल पैनऑप्टिकॉन) होता है, जो अदालती माहौल को प्रभावित करने की कोशिश करता है।
इसी कार्यक्रम में मौजूद जस्टिस उज्जल भुयान ने भी संयम की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि अदालती संयम को कभी भी कमजोरी नहीं माना जाना चाहिए।
जस्टिस मसीह ने जजों को भी आत्मचिंतन की सलाह दी। उन्होंने कहा कि न्यायपीठ से बोला गया हर एक शब्द संविधान के मूल्यों को या तो मजबूत करता है या उन्हें ठेस पहुंचाता है। जजों को 'गैलरी के लिए खेलने' (सार्वजनिक वाहवाही लूटने) की लालसा से बचना चाहिए।
जब कोई न्यायाधीश किसी एक वायरल होने वाले डायलॉग के लिए धीमी और गंभीर न्यायिक प्रक्रिया को छोड़ देता है, तो वह कानून का संरक्षक रहने के बजाय केवल डिजिटल शोर का एक हिस्सा बनकर रह जाता है।
सोशल मीडिया और लाइव स्ट्रीमिंग के दौर में अदालती निष्पक्षता को लेकर चिंता जताने वाले जस्टिस मसीह पहले जज नहीं हैं। इससे पहले भी कई मौकों पर देश के शीर्ष न्यायविदों ने इस खतरे की ओर इशारा किया है:
इसमें कोई दो राय नहीं कि टेक्नोलॉजी और अदालती सुनवाई के सीधे प्रसारण (Live Streaming) ने आम नागरिक के लिए इंसाफ के दरवाजे पारदर्शी बनाए हैं। लेकिन अगर बिना संदर्भ की क्लिपिंग्स का इस्तेमाल जजों को नीचा दिखाने या कानूनी प्रक्रिया को एक रियालिटी शो बनाने के लिए किया जाएगा, तो इससे आम जनता का भरोसा न्यायपालिका से उठ सकता है।
न्याय किसी व्यूज (Views) या लाइक्स का मोहताज नहीं हो सकता इसे संविधान और साक्ष्यों की गरिमा के साथ ही जिंदा रखा जा सकता है।
Updated on:
02 Aug 2026 11:26 am
Published on:
02 Aug 2026 11:26 am
