
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सीएम सिद्धारमैया और उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार। (Photo-IANS)
POWER-STRUGGLE: देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों का शोर थमते ही दक्षिण भारत के अहम राज्य कर्नाटक से एक बड़ी सियासी हलचल सामने आ रही है। कर्नाटक कांग्रेस के अंदर लंबे समय से शांत दिख रही मुख्यमंत्री पद की लड़ाई एक बार फिर सतह पर आ गई है। राज्य के उप-मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार के दिए गए एक ताजा बयान ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिद्धारमैया सरकार का आधा कार्यकाल (ढाई साल) पूरा होने के नजदीक आते ही शिवकुमार खेमा अब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपना दावा मजबूती से ठोक रहा है।
बेंगलुरु के गलियारों में चर्चा तेज है कि जब 2023 में राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी थी, तब हाईकमान ने सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच सत्ता की साझेदारी (पावर-शेयरिंग) का एक गुप्त फॉर्मूला तय किया था। अब जब पांच राज्यों के चुनाव और केरल के आंतरिक मसले सुलझ चुके हैं, तो शिवकुमार के समर्थक चाहते हैं कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व अपना वादा निभाए। खुद उप-मुख्यमंत्री ने अपने बयान में कहा है कि वे पार्टी के वफादार सिपाही हैं और आलाकमान जो भी निर्देश देगा, वे उसका पालन करेंगे। हालांकि, उनके इस संयमित बयान के पीछे एक गहरा सियासी संदेश छिपा है, जिसने सिद्धारमैया खेमे की धड़कनें बढ़ा दी हैं।
दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का खेमा इतनी आसानी से मैदान छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। सिद्धारमैया के करीबी मंत्रियों और विधायकों ने इस बदलाव की अटकलों को खारिज करना शुरू कर दिया है। मंत्रियों का कहना है कि राज्य में मुख्यमंत्री पद को लेकर कोई भ्रम नहीं है और सिद्धारमैया अपना पूरा कार्यकाल करेंगे। इस बीच, पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यकों (अहिंडा गठबंधन) के नेताओं ने दिल्ली की ओर रुख किया है ताकि वे आलाकमान पर दबाव बना सकें कि सिद्धारमैया को पद से न हटाया जाए।
इस पूरे विवाद के बीच कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पार्टी नेताओं को आश्वासन दिया है कि कर्नाटक का मामला जल्द ही सुलझा लिया जाएगा। दरअसल, विवाद सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी तक सीमित नहीं है। राज्य में मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल की मांग भी लंबे समय से लंबित है। कई वरिष्ठ विधायक मंत्री पद न मिलने से नाराज हैं, तो वहीं नए चेहरे भी अपनी दावेदारी कर रहे हैं। ऐसे में अगर आलाकमान ने समय रहते इस कलह को नहीं शांत किया, तो कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के लिए आगे की राह बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम पर विपक्ष विशेषकर बीजेपी और जेडीएस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस जनता की भलाई करने के बजाय सिर्फ मलाई (कुर्सी) के लिए आपस में लड़ रही है। वहीं, कांग्रेस आलाकमान इस मामले पर पूरी तरह नजर बनाए हुए है और किसी भी सार्वजनिक बयानबाजी से बचने की सलाह दे रहा है।
आने वाले दिनों में डीके शिवकुमार और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की दिल्ली में पार्टी नेतृत्व के साथ एक हाई-प्रोफाइल बैठक होने की संभावना है। खड़गे, सोनिया गांधी और राहुल गांधी की मौजूदगी में इस 'ढाई-ढाई साल' के फॉर्मूले पर अंतिम मुहर लग सकती है। इसके साथ ही असंतुष्ट विधायकों को साधने के लिए कैबिनेट में फेरबदल का खाका भी तैयार किया जा सकता है।
बहरहाल, इस कुर्सी युद्ध के पीछे कर्नाटक का जातीय समीकरण भी बहुत अहम भूमिका निभा रहा है। डीके शिवकुमार प्रभावशाली 'वोक्कालिगा' समुदाय से आते हैं, जबकि सिद्धारमैया के पास 'अहिंडा' (पिछड़ा वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक) का मजबूत आधार है। वोक्कालिगा समुदाय के संतों और धार्मिक गुरुओं ने खुलेआम मांग की है कि शिवकुमार को तुरंत मुख्यमंत्री बनाया जाए, जिससे यह लड़ाई अब राजनीतिक से ज्यादा सामाजिक और जातीय रूप ले चुकी है। (इनपुट: ANI)
Updated on:
20 May 2026 02:31 pm
Published on:
20 May 2026 02:29 pm
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