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न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है या नहीं? जरूरी है न्यायपालिका से आए इसका जवाब

भ्रष्टाचार हर जगह पैर पसार चुका है। न्यायपालिका भी इससे बची नहीं रह गई है। इससे जुड़े लोग दबी जुबान में या सिस्टम से बाहर ऐसा मानते भी हैं। जरूरी है कि सिस्टम के अंदर इस पर बात हो और इसका समाधान निकले। नहीं तो जनता का न्यायपालिका से भरोसा खत्म होते देर नहीं लगेगी।
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Corruption cases in chhattisgarh

अदालतें इंसाफ का मंदिर हैं और वहां न्याय के देवता/देवी विराजते हैं, जिनके हाथों जनता को नाइंसाफी नहीं मिल सकती। न्यायपालिका को लेकर यह पुरानी मान्यता हाल के वर्षों में भले कमजोर हुई हो, पर पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। लेकिन, इसका खतरा बढ़ता जा रहा है। और, इसकी वजह खुद न्यायपालिका के अंदर से आने वाली खबरें हैं।

जज रहते हुए चलाते रहे गैस एजेंसी

16 जुलाई को खबर आई कि एक न्यायमूर्ति जो दिल्ली हाई कोर्ट में जज और मणिपुर में मुख्य न्यायाधीश रहे, पद पर रहते हुए अपने नाम से गैस (एलपीजी) एजेंसी भी चलाते रहे। रिटायरमेंट के करीब डेढ़ साल बाद भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) ने उन्हें नोटिस भेजा और पूछा कि आपने करार की शर्तें तोड़ी हैं तो क्यों न आपकी डीलरशिप खत्म कर दी जाए? रिटायर्ड जज ने नोटिस का जवाब नहीं दिया तो बीपीसीएल ने छह जुलाई को डीलरशिप खत्म कर दी।

न्यायपालिका की साख गिराने वाली खबरें एक नहीं, अनेक हैं

न्यायपालिका की साख कम करने वाली खबरें इन दिनों अक्सर आती रहती हैं। दिल्ली हाई कोर्ट के ही जज यशवंत वर्मा का मामला अभी भी गरम है। वर्मा के दिल्ली स्थित बंगले पर 14 मार्च, 2025 को लगी आग में नोटों के बंडल जलने का मामला सामने आया था। उन्हें पहले इलाहाबाद ट्रांसफर कर दिया गया। बाद में जांच के आधार पर हटाने की कार्रवाई के लिए कहा गया तो 9 अप्रैल, 2026 को जज साहब ने इस्तीफा दे दिया। अब बहस गरम है कि क्या इस्तीफा दे चुके जज पर महाभियोग चलाया जा सकता है?

कलकत्ता हाई कोर्ट के जज थे अभिजीत गंगोपाध्याय। 2024 के लोक सभा चुनाव के समय उन्होंने इस्तीफा देकर तत्काल बीजेपी का टिकट लिया और तामलुक से सांसद बन गए। चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी के खिलाफ उन्होंने ऐसी टिप्पणी भी की कि चुनाव आयोग ने 24 घंटे के लिए उन्हें प्रचार करने से प्रतिबंधित कर दिया।

रंजन गोगोई सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद से रिटायर होने के कुछ ही समय बाद राज्य सभा सांसद बन गए।

50 करोड़ के घपले में जज बर्खास्त

2019 में 50 करोड़ के घपले के आरोप में रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल (आरसीटी) के जज आरके मित्तल को बर्खास्त किया गया था। आरोप था कि जज ने वकीलों से मिल कर मुआवजा देने के मामले में मनमाफिक फैसले देकर पैसों की बंदरबांट की थी। रेलवे में इतने बड़े घोटाले में किसी जज को हटाए जाने का यह पहला मामला बताया जाता है।

2008 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में जज निर्मल यादव का मामला बड़ा चर्चा में आया था। कहा गया कि पार्सल के जरिये उनके लिए 15 लाख रुपये किसी ने भेजे थे, लेकिन पार्सल गलती से जस्टिस निर्मलजीत कौर के घर डिलीवर हो गया। जस्टिस निर्मल यादव को सस्पेंड किया गया था। घूसखोरी के मामले में सिटिंग जज पर ऐसी कार्रवाई का यह विरला मामला था।

वकीलों ने जज के दफ्तर में कैमरे लगा खोली घूसख़ोरी की पोल

गुजरात के भावनगर में सीहोर की अदालत के जज जेडी आचार्या वकीलों से रिश्वत की बात करते कैमरे में कैद हो गए थे। 2015 का यह मामला तब खूब चर्चा में आया था। उसी साल 30 अगस्त को जामनगर जिले में जामखंभलिया कोर्ट के जज पीडी इनामदार भी इसी तरह कैमरे में कैद हुए थे। उन्हें तो जेल तक जाना पड़ गया था। इन दोनों जजों के कोर्टरूम में वकीलों ने ही खुफिया कैमरे लगाए थे।

अपने अंदर के भ्रष्टाचार पर बात करने को तैयार नहीं न्यायपालिका!

निचली अदालतों में जजों के भ्रष्टाचार से जुड़े कई मामले समय-समय पर सामने आते ही रहते हैं। सीनियर वकील दुष्यंत दवे ने पत्रिका.कॉम से बातचीत में कहा था कि भले ही बहुत थोड़े जज भ्रष्टाचार करते होंगे, लेकिन सिस्टम में दबी जुबान से इसकी बात हर कोई करता मिल जाएगा। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दखलअंदाजी भी एक तरह का भ्रष्टाचार ही है। उन्होंने निजी अनुभव के आधार पर बताया कि कई बार जज की ओर से ऐसे फैसले आए जो उम्मीद से परे थे।

दस साल में मौजूदा जजों के खिलाफ सीजेआई के पास 8600 से ज्यादा शिकायतें आईं। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण कहते हैं कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर बात होनी चाहिए। लेकिन, पिछले दिनों एनसीईआरटी की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को एक चुनौती के रूप में बताया गया तो सुप्रीम कोर्ट पूरी तरह भड़क गया था। उसने न केवल किताब को बैन करा नए सिरे से छपवाया, बल्कि बैन की गई किताब लिखने से जुड़े विशेषज्ञों को भी बैन कर दिया।