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रेप का आरोपी ऐसे बच निकला! मूक-बधिर महिला के केस में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, गवाही के दौरान हुई इस चूक ने पलट दी बाजी

मद्रास उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक मूक-बधिर महिला के साथ बलात्कार के मामले में एक व्यक्ति की सजा को धोखाधड़ी के मामले में परिवर्तित कर दिया।

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Court orders

फाइल फोटो

मद्रास हाईकोर्ट ने एक संवेदनशील मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए बलात्कार के आरोपी को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने 20 वर्षीय मूक-बधिर (deaf and mute) महिला के साथ कथित बलात्कार के मामले में ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि को पलट दिया और आरोपी को बलात्कार (Section 376 IPC) के बजाय सिर्फ धोखाधड़ी (cheating) का दोषी माना। यह फैसला 12 जनवरी 2026 को जस्टिस एम. निर्मल कुमार ने सुनाया, जिसमें मुख्य आधार पीड़िता की गवाही रिकॉर्डिंग में प्रक्रियागत चूक और इंटरप्रेटर की लापरवाही रहा।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी 7 साल की सजा

घटना की शुरुआत 18 नवंबर 2015 को तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले के पेनागरम में हुई, जहां 20 साल की मूक-बधिर महिला के साथ कथित तौर पर यौन उत्पीड़न हुआ। शिकायत 28 नवंबर 2015 को दर्ज हुई, जब पीड़िता की मां बेंगलुरु से लौटीं। जांच के बाद आरोपी पर IPC की धारा 376 (बलात्कार) के तहत केस चला। ट्रायल कोर्ट ने 11 दिसंबर 2018 को आरोपी को दोषी ठहराया और 7 साल की सख्त कैद के साथ 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।

आरोपी ने खटखटाया हाईकोर्ट का दरवाजा

आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की, जहां जस्टिस निर्मल कुमार ने गहन जांच की। कोर्ट ने पाया कि पीड़िता की स्टेटमेंट (धारा 161 और 164 CrPC के तहत) रिकॉर्ड करने वाले इंटरप्रेटर ने संकेतों और जेस्चर (signs and gestures) का कोई जिक्र नहीं किया, जो ऐसी गवाही की विश्वसनीयता के लिए बेहद जरूरी है। कोर्ट ने कहा, 'पीड़िता की किसी भी स्टेटमेंट में संकेतों और जेस्चर का कोई संदर्भ नहीं है, जो इंटरप्रेटेशन को विश्वसनीय बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।

गवाही में 'संकेतों' की चूक ने पलट दी बाजी

इसके अलावा, गवाही रिकॉर्डिंग के दौरान अनिवार्य प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों का पालन नहीं हुआ, जैसे इंटरप्रेटर को शपथ दिलाना। मेडिकल रिपोर्ट में भी पीड़िता के निजी अंगों में कोई हालिया चोट नहीं पाई गई। कोर्ट ने तारीखों में विरोधाभास (18 नवंबर vs 27 नवंबर) और शादी की चर्चा जैसे परिस्थितिजन्य तथ्यों को भी ध्यान में रखा, जिससे बल प्रयोग साबित नहीं हो सका।
जस्टिस निर्मल कुमार ने स्पष्ट किया कि मुख्य रूप से पीड़िता की गवाही पर ही दोषसिद्धि टिकी नहीं रह सकती, खासकर जब इंटरप्रेटेशन में इतनी बड़ी खामी हो। नतीजतन, बलात्कार का आरोप हटा दिया गया और आरोपी को सिर्फ धोखाधड़ी का दोषी ठहराया गया। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को संशोधित करते हुए सजा को कम किया।

हाइकोर्ट के फैसले से पीड़िता का परिवार निराश

यह फैसला दिव्यांगजनों के साथ यौन अपराधों में गवाही रिकॉर्डिंग की संवेदनशीलता और सख्त प्रक्रियाओं पर जोर देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में इंटरप्रेटर की ट्रेनिंग और प्रक्रियागत अनुपालन बेहद जरूरी है, वरना न्याय की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। पीड़िता के परिवार और महिला अधिकार संगठनों में इस फैसले से निराशा है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञ इसे प्रक्रियागत न्याय का उदाहरण मानते हैं।