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ममता बनर्जी: ‘खेला’ में शुरू से माहिर, एक दांव से पहले ही चुनाव में दिग्गज नेता को कर दिया था चित

ममता बनर्जी मेहनती नेता के साथ-साथ मौका पहचानने और अपने पक्ष में भुनाने में माहिर भी हैं। छोटी सी बात को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना कर जीतने का नुस्खा वह 1984 में अपने पहले चुनाव में ही आजमा चुकी हैं।

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Mamata Banerjee

ममता बनर्जी (फोटो- एएनआई)

ममता बनर्जी जुझारू नेता तो हैं ही, लेकिन चुनाव में 'खेला' करने में भी शुरू से ही माहिर रही हैं। 1984 में अपने पहले ही चुनाव में उन्होंने ऐसा 'खेला' कर दिया था कि उनका काम बन गया। उनका मुकाबला दिग्गज सांसद सोमनाथ चटर्जी से था। उनसे मुलाक़ात के दौरान एक छोटी सी बात को ममता ने इतना बड़ा बना दिया कि सोमनाथ दा का चुनावी खेल ही बिगड़ गया। वह जिंदगी में पहली और आखिरी बार लोक सभा का चुनाव हारे थे।

2021 के पिछले चुनाव में भी ममता बनर्जी पैरों में प्लास्टर के साथ चुनाव प्रचार करते दिखी थीं। 2011 में भी उन्होंने मौका पहचान कर उसे भुनाने की अपनी कला का बखूबी परिचय दिया था।

ऐसे दिग्गज से हुआ था ममता बनर्जी का पहला चुनावी मुक़ाबला

1984 का चुनाव ममता बनर्जी का पहला लोक सभा चुनाव था। पश्चिम बंगाल में जाधवपुर से सोमनाथ चटर्जी लगातार सांसद बनते आ रहे थे। उनके पिता बड़े बैरिस्टर और पुराने सांसद थे। ज्योति बसु, हरकिशन सिंह सुरजीत, प्रमोद दासगुप्ता जैसे दिग्गज वामपंथी नेताओं का उनके घर अक्सर आना-जाना होता था। सोमनाथ दा का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था। वह वकालत में व्यस्त और मस्त थे। उन पर चुनाव लड़ने का दबाव बना। शुरू में तो उन्होंने दिलचस्पी नहीं दिखाई, लेकिन अंत में कहा कि पिता कहेंगे तो लड़ जाएंगे।

एक दिन सोमनाथ दा अदालत में थे, उधर कुछ वामपंथी नेता उनके पिता को मनाने पहुंच गए। पिता ने हां कर दी। इस तरह सोमनाथ बनर्जी राजनीति में आ गए। वह बर्दवान से निर्दलीय (माकपा के निशान पर) लड़े और अच्छी तरह जीते। बाद में उन्होंने माकपा जॉइन कर ली। 1977 और 1980 में वह जाधवपुर से लड़े और लगातार तीन बार सांसद बन गए।

कांग्रेस को कोई मिल नहीं रहा था, ऐसे तय हुआ ममता बनर्जी का टिकट

चौथी बार कांग्रेस सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ कोई नया और जुझारू चेहरा उतरना चाहती थी। उसे ऐसा कोई मिल नहीं रहा था। प्रणब मुखर्जी तब वित्त मंत्री थे। उन्होंने सुब्रत मुखर्जी से बात की। सुब्रत दा पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के बड़े नेता थे।

राजीव गांधी चाहते थे कि जाधवपुर से किसी युवा नेता को लड़ाया जाए, लेकिन कोई लड़ने को तैयार नहीं था। सुब्रत मुखर्जी ने प्रदीप घोष और सुशोभन बनर्जी से बात की, लेकिन दोनों ने मना कर दिया। तब उन्होंने ममता का नाम दिल्ली भेजा।

शुतापा पॉल ने अपनी किताब 'दीदी: द अनटोल्ड ममता बनर्जी' में लिखा है कि सुब्रत मुखर्जी ने प्रणब दा को फोन किया और कहा, 'आप इस लड़की को जानते हैं। वह बड़ी जुझारू है…आप उससे मिले भी हैं।'

असल में, 1983 में कलकत्ता में जब कांग्रेस का सम्मेलन हुआ था तो ममता बनर्जी को दिल्ली से आए बड़े नेताओं की मेहमाननवाजी की ज़िम्मेदारी दी गई थी। इसी क्रम में प्रणब मुखर्जी से वह मिली थीं।

ममता के नाम पर सहमति बन गई। तब तक सोमनाथ चटर्जी ममता को जानते भी नहीं थे, लेकिन चुनाव नतीजे आए तो उन्हें सब जानने लगे। ममता जीत चुकी थीं। उन्होंने तीन बार के सांसद को पहली बार में ही हरा दिया था। इस जीत ने ममता के सितारे बुलंद कर दिए। वह राजीव गांधी की पसंदीदा नेता बन गईं।

पहले चुनाव में ही ममता बनर्जी ने कर दिया था 'खेला'

पर्चा भरने के कुछ ही दिन बाद सोमनाथ और ममता का आमना-सामना हुआ। ममता पैर छूने के लिए झुकीं, सोमनाथ दा ने झिझकते हुए हाथ आगे कर उन्हें रोका। दोनों ओर से यह एकदम सामान्य व्यवहार था, लेकिन ममता ने इसे बड़ा राजनीतिक विवाद बना दिया। सोमनाथ पर अपने अपमान का आरोप लगाया। जीत के प्रति आश्वस्त सोमनाथ दा और उनकी पार्टी ने इसे हल्के में लिया, लेकिन ममता 'खेल' कर गई थीं। चुनाव नतीजे आने के बाद सोमनाथ दा को इसका अहसास हुआ।

दस बार सांसद रहे सोमनाथ बनर्जी इस एक हार को छोड़ कर कभी नहीं हारे थे।

मौका पहचानने और भुनाने में माहिर ममता

ममता बनर्जी की खूबी है कि वह मौके को पहचानती हैं और उसको भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती हैं। 2011 के चुनाव में बंगाल से करीब साढ़े तीन दशक पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने में भी उन्होंने अपनी इसी खूबी का इस्तेमाल किया। उन्होंने सिंगूर के मुद्दे में इसके लिए संभावना देखी और उस संभावना को पूरी तरह भुनाया। (पूरी कहानी यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

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