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Mysore Royal Family Property Dispute: प्रिवी पर्स गया, लेकिन राजघरानों की विरासत का कानून नहीं बदला; मैसूर-संदूर केस में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Privy Purse Abolition 1971: राजाओं का राज खत्म हुआ, लेकिन कुछ ऐतिहासिक संपत्तियों पर लागू उत्तराधिकार की व्यवस्था खत्म नहीं हुई। कर्नाटक हाईकोर्ट ने धारा 5(2) को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर पुराने विलय समझौतों और मौजूदा कानून के बीच संबंध स्पष्ट कर दिया।
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भारत

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Manoj Vashisth

Aug 13, 2026

Karnataka High Court Royal Family Case

Karnataka High Court Royal Family Case: कर्नाटक हाईकोर्ट राजघराना मामला

Karnataka High Court Royal Family Case: देश में राजशाही भले ही इतिहास बन चुकी हो, लेकिन पुराने राजघरानों की कुछ संपत्तियों से जुड़े कानूनी सवाल आज भी अदालतों में जिंदा हैं। कर्नाटक हाईकोर्ट के ताजा फैसले ने इसी पुराने विवाद की एक अहम गांठ खोल दी है। अदालत ने साफ किया कि 1971 में प्रिवी पर्स और राजाओं के संवैधानिक विशेषाधिकार खत्म किए जाने का मतलब यह नहीं था कि रियासतों के विलय के दौर में बनी हर उत्तराधिकार व्यवस्था भी समाप्त हो गई। मैसूर और संदूर राजपरिवार से जुड़े मामलों में कोर्ट ने इसी अंतर को निर्णायक माना।

1971 में खत्म हुई राजशाही की पहचान, संपत्ति का हर नियम नहीं

1971 में प्रिवी पर्स खत्म होने के बाद पूर्व राजघरानों की संपत्तियों के उत्तराधिकार के नियम भी खत्म हो गए हों, ऐसा नहीं है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने मैसूर और संदूर के पूर्व राजपरिवारों से जुड़े दो संपत्ति विवादों में यह अहम फैसला दिया है। न्यायमूर्ति एमजीएस कमल ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 5(2) को वैध और लागू मानते हुए दो याचिकाएं खारिज कर दीं।

मामला मैसूर राजघराने का, दावा नाती का

पहली याचिका चदुरंगा कांतराज उर्स ने दायर की थी। वे मैसूर के अंतिम महाराजा जयचामराजेंद्र वाडियार की बेटी गायत्री देवी के बेटे होने का दावा करते हैं। अपने मामा श्रीकांतदत्त नरसिंहराजा वाडियार की मृत्यु के बाद उन्होंने पारिवारिक संपत्तियों में हिस्सा मांगते हुए बंटवारे का मुकदमा दायर किया। इसके जवाब में दूसरे पक्ष ने कहा कि इन संपत्तियों पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू ही नहीं होता, क्योंकि धारा 5(2) के तहत ऐसी अविभाज्य संपदा का उत्तराधिकार एक ही उत्तराधिकारी को मिल सकता है।


दूसरी याचिका वेंकटराव वाई. घोरपड़े और गायत्री घोरपड़े ने दायर की। दोनों संदूर के पूर्व महाराजा यशवंतराव घोरपड़े के बच्चे हैं। पारिवारिक संपत्तियों के बंटवारे के मुकदमे में एक ट्रस्ट ने दलील दी कि धारा 5(2) के कारण हिंदू उत्तराधिकार कानून इन संपत्तियों पर लागू नहीं होता। इसी को याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

कोर्ट ने क्या कहा

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 1971 के 26वें संविधान संशोधन ने प्रिवी पर्स, राजाओं की आधिकारिक मान्यता और विशेषाधिकार खत्म किए, लेकिन इससे पूर्व रियासतों के विलय समझौतों के तहत चली आ रही अविभाज्य संपदा की उत्तराधिकार व्यवस्था अपने आप खत्म नहीं हुई। ऐसी संपदा में, जहां पुरानी व्यवस्था लागू है, ज्येष्ठाधिकार का नियम जारी रह सकता है। हालांकि पूर्व शासक की सामान्य निजी संपत्ति पर संबंधित परिवार का निजी उत्तराधिकार कानून लागू होगा। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि 'गद्दी' अब किसी राजकीय या संप्रभु अधिकार का प्रतीक नहीं है। उसका महत्व आज ऐतिहासिक और सांस्कृतिक है।