13 अगस्त 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

‘बच्चे माता-पिता की संपत्ति नहीं, उन्हें जीवनसाथी चुनने की आजादी’, बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच का फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने कहा कि बालिग बच्चे माता-पिता की संपत्ति नहीं हैं। बालिग महिला को अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने और जीवनसाथी चुनने का अधिकार है।
2 min read
Google source verification
right to choose life partner

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit- IANS)

Woman Right: बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने एक अहम फैसले में कहा कि बलिग बच्चे स्वतंत्र व्यक्ति हैं। वे माता-पिता की संपत्ति नहीं हैं। कोई बालिग महिला अपनी मर्जी से किसी के साथ रहना चाहती है, तो उसकी कस्टडी के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह फैसला एक मां की याचिका खारिज करते हुए सुनाया गया। मां ने अपनी बेटी की कस्टडी मांगी थी, जिसने अपनी पसंद के लड़के के साथ रहने का फैसला किया था।

मां ने हाई कोर्ट में कस्टडी के लिए लगाई थी याचिका

पुलिस के मुताबिक नागपुर की रहने वाली एक लड़की 17 साल की उम्र में ट्यूशन जाने के बहाने घर से निकली थी। बाद में सीसीटीवी फुटेज में वह एक लड़के साथ जाती दिखी। पुलिस ने उसे ढूंढकर मां को सौंप दिया। कुछ समय बाद लड़की फिर घर से चली गई। इसके बाद मां ने हाई कोर्ट में कस्टडी के लिए याचिका लगाई। सुनवाई के दौरान कोर्ट में लड़की ने कहा कि कि वह मर्जी से उस लड़के के साथ रह रही है और उसी के साथ रहना चाहती है।

कोर्ट ने सुनाया फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने कहा कि लड़की अब बालिग है। उसे जीवन साथी चुनने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने मां के उस आरोप को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि लड़की के नाबालिग होने पर उसे गैर-कानूनी तरीके से रखा था। हाईकोर्ट ने कहा कि कस्टडी के मामलों में बच्चों की भलाई सबसे जरूरी है। यह माता-पिता के अधिकारों से ऊपर है।

कोर्ट ने लड़की से सीधे बातचीत की

कोर्ट ने इस मामले में लड़की से सीधे बातचीत की। लड़की ने कोर्ट को बताया कि वह अपनी मर्जी से मां का साथ जोड़कर युवक के साथ गई थी। वह उसके साथ रहना चाहती है। इस पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की कि लड़की बालिग हो चुकी है। उसे मनपसंद से अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार है। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कस्टडी के मामलों में बच्चों की भलाई सबसे ज्यादा जरूरी है। यह माता-पिता के अधिकारों से ऊपर है।