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नीतीश के दोस्त ने करवाई थी मुलाक़ात, दिल्ली के रेस्तरां में पहली बार हुई थी बीजेपी से हाथ मिलाने की बात

नीतीश कुमार ने बिहार के सीएम पद से इस्तीफा दे दिया है। इसी के साथ उनकी राजनीति का नया अध्याय शुरू हो रहा है। जानिए, पहली बार कैसे भाजपा के संपर्क में आए थे नीतीश।

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पटना

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Vijay Kumar Jha

Apr 14, 2026

नीतीश कुमार

नीतीश कुमार (फोटो-X@SanjayJha)

नीतीश कुमार और लालू यादव शुरू में साथ-साथ थे। पहली बार 1994 में नीतीश ने लालू से अलग रास्ता लिया। अपनी समता पार्टी बना कर। 1995 में पहली बार नीतीश की समता पार्टी बिहार विधानसभा चुनाव लड़ी। पार्टी ने 324 में से 310 सीटों पर उम्मीदवार उतारा था, लेकिन 271 की जमानत जब्त हो गई।

नीतीश कुमार पटना के पुनाईचक में एक छोटे से घर में थे। यह घर उनके इंजीनियर दोस्त अरुण कुमार का था। नीतीश न तो फोन पर किसी से बात करना चाह रहे थे और न ही किसी से मिलना चाह रहे थे। पत्रकारों से तो बिल्कुल नहीं। दूरदर्शन पर लालू, भाजपा के शत्रुघ्न सिन्हा और कांग्रेस के जगन्नाथ मिश्रा के साथ परिचर्चा का एक कार्यक्रम पहले से तय था। उन्होंने इसमें भी शामिल होने से मना कर दिया। उन्होंने इस परिचर्चा में अपनी जगह भोला प्रसाद सिंह को जाने के लिए कहा।

भोला सिंह ही थे, जिन्होंने चुनाव में समता पार्टी का भाकपा (माले) से गठबंधन कराया था। यह गठबंधन आग और पानी का मेल साबित हुआ। नीतीश का वोट बैंक कुर्मी-कोयरी जमीन वाले और जमीन से वंचित भाकपाई समर्थकों का कोई मेल नहीं बैठा। इसलिए नीतीश को लगा कि टीवी पर चर्चा में भोला बाबू को भेजना ही ठीक रहेगा।

नीतीश श्रीकृष्णापुरी में ज्ञानु के घर आ गए थे। टीवी ऑन था। टीवी वाले कह रहे थे, 'चले थे सरकार बनाने और जनता ने क्या बना दिया…' नीतीश बुदबुदाए- एक दिन तो सरकार बना कर रहेंगे। उन्होंने टीवी बंद करवा दिया और कहा, 'ज्ञानु जी, किसी को मत बताइए कि हम यहां हैं।'

नीतीश टूट गए थे। वह सांसद थे, लेकिन कुछ दिनों के लिए संसद जाने से भी उनका मोह भंग हो गया था। वह किताबों में रमने लगे थे। लोहिया और कौटिल्य का अर्थशास्त्र पढ़ने लगे थे। कुछ लोगों ने उन्हें सलाह दी कि लालू से हाथ मिला लिया जाए। सलाह देने वालों को तो उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन मन में तय किया कि लालू के पास नहीं लौटना है।

इसी बीच पत्रकार और भाजपा के रणनीतिकार दीनानाथ मिश्रा ने नीतीश के पुराने दोस्त सरजू राय को फोन किया। उनसे कहा- मुझे नीतीश से मिलवाइए।

दरअसल दीनानाथ मिश्रा का आंकलन था कि अगर नीतीश अपने वोट बैंक (कोयरी-कुर्मी) को अगड़ी जातियों वाले भाजपा के वोट बैंक से मिला कर आगे बढ़ें तो उन्हें फायदा पहुंच सकता है। मिश्रा का मानना था कि लालू को विपक्षी वोट के बिखराव का फायदा मिला है।

दिल्ली के कनॉट सर्कस के एक रेस्तरां में मिश्रा और नीतीश की मुलाक़ात हुई। कॉफी के साथ बातें हुईं। दोनों इस बात पर सहमत थे कि लालू बिहार के लिए ठीक नहीं हैं, इन्हें हराना जरूरी है। लेकिन, दीनानाथ मिश्रा ने अपने आंकलन के आधार पर जब नीतीश और भाजपा के समझौते की बात की तो उन्हें यह पची नहीं। एक समाजवादी भला कैसे भाजपाइयों से हाथ मिला सकता है!

दिवंगत पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब 'द ब्रदर्स बिहारी' में लिखा है कि दीनानाथ मिश्रा ने भाजपा के बड़े नेताओं से बात की। कुछ दिन बाद उन्होंने नीतीश को फोन किया और कहा- लाल कृष्ण आडवाणी आपसे मिलना चाहते हैं। उनका मन नहीं हो रहा था। लेकिन, सरजू राय ने समझाया- मिलने में कोई बुराई नहीं है।
कुछ ही महीने बाद नीतीश मुंबई में भाजपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में विशिष्ट आमंत्रित अतिथि के रूप में शरीक हो रहे थे और इसके तुरंत बाद भाजपा और समता पार्टी एक-दूसरे की सहयोगी बन चुकी थीं।

इसके बाद हुए चुनाव में नीतीश को मुख्यमंत्री बनने का मौका भी मिल गया। हालांकि, इस बार उन्हें जल्दबाज़ी में इस्तीफा भी देना पड़ा, लेकिन 2005 में जब नीतीश सीएम बने तो फिर बने ही रहे।