
एक समय था जब ममता बनर्जी चुनाव आयोग के समर्थन में सड़क पर उतरने की योजना बना रही थीं।
पश्चिम बंगाल में 2026 में हुए विधान सभा चुनाव का असर सिर्फ इतना नहीं रहा कि ममता बनर्जी की 15 साल पुरानी सत्ता चली गई, बल्कि इस चुनाव ने उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की पहचान भी मिटा दी। चुनाव में करारी हार के बाद टीएमसी में हुई बगावत के चलते पार्टी दो फाड़ हो गई थी। अब राज्य में होने जा रहे उपचुनावों के लिए चुनाव आयोग ने 18 सितंबर को दोनों खेमों को अलग नाम और पहचान दे दिया है। ममता खेमा 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' के नाम और 'फुटबॉल खिलाड़ी' के निशान के साथ उपचुनाव लड़ेगा। बागी गुट को चुनाव आयोग ने 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' का नाम और 'लिफाफे' के निशान दिया है।
पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव 2026 कई मायनों में अलग रहा था। यह चुनाव महज तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), कांग्रेस व वाम दलों के बीच का मुकाबला नहीं रह गया था। चुनाव आयोग, कोर्ट, प्रशासन को भी इस चुनाव में एक तरह से पार्टी बना दिया गया था।
एसआईआर को लेकर ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, तो भाजपा खुल कर आयोग के समर्थन में थी। बनर्जी चुनाव आयोग पर भाजपा के हित में काम करने का आरोप लगाती रही हैं। वह चुनाव आयोग के खिलाफ सड़क से लेकर अदालत तक लड़ रही है। चुनाव से ऐन पहले भी बाहर जहां उन्होंने आयोग के खिलाफ धरना दिया, वहीं कोर्ट के अंदर खुद पेश होकर एसआईआर के खिलाफ दलील पेश की थी। लेकिन, उन्हें अदालत से राहत नहीं मिली थी।
चुनाव आयोग से ममता का संबंध हाल के वर्षों में एकदम कटुता भरा रहा है। हालांकि, एक समय ऐसा भी था जब ममता बनर्जी चुनाव आयोग के आदेश के समर्थन में अभियान चलाने की योजना बना रही थीं। तब ममता विपक्ष की नेता थीं और सरकार आयोग के आदेश का विरोध कर रही थी। तब की ज्योति बसु सरकार ने भी चुनाव आयोग को कोर्ट में घसीटा था, लेकिन उसने वहां हथियार भी डाल दिए थे। चुनाव आयोग ने भी कड़ा रुख अख़्तियार करते हुए राज्य में कोई चुनाव नहीं करवाने का फैसला ले लिया था।
विवाद की शुरुआत 1992 में हुई। टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे। उन्होंने भारत सरकार को एक अनुरोध भेजा। अनुरोध सभी मतदाताओं के लिए पहचान पत्र (वोटर आईडी कार्ड) बनाने का था। सरकार ने इस पर चुप्पी साध ली। शेषन ने सख्ती से नियमों का हवाला देते हुए सरकार को अपना अधिकार याद दिलाया और 28 अगस्त, 1993 को उन्होंने एक आदेश जारी किया। इसमें कहा गया कि 1 जनवरी, 1995 के बाद कोई भी चुनाव बिना मतदाता पहचान पत्र के नहीं होगा। आदेश पर अमल के लिए सरकार के पास समय काफी था (सितंबर 1993 से दिसंबर 1994 तक)।
15 नवम्बर, 1993 को पश्चिम बंगाल, पंजाब, असम, कर्नाटक और मध्य प्रदेश के महाधिवक्ताओं ने दिल्ली में बैठक की। इन्होंने वोटर आईडी कार्ड अनिवार्य किए जाने के चुनाव आयोग के आदेश को असंवैधानिक और संविधान के मूल ढांचे को नुकसान पहुंचाने की नीयत से उठाया गया कदम बताया।
शेषन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। 15 दिसंबर, 1993 को उन्होंने एक और ऑर्डर निकाला। इसमें उन प्रक्रियाओं का ब्योरा था जिन पर अमल करके समय सीमा के भीतर सभी मतदाताओं के पहचान पत्र बनवाए जा सकते थे।
पश्चिम बंगाल सरकार ने इस आदेश के खिलाफ कोर्ट जाने की घोषणा कर दी। सरकार का कहना था कि आदेश अव्यावहारिक है और इससे उस पर 160-180 करोड़ रुपये का आर्थिक बोझ पड़ेगा।
पश्चिम बंगाल सरकार चुनाव आयोग के आदेश पर अमल के लिए कोई कार्रवाई नहीं कर रही थी। यह देखते हुए आयोग ने 28 दिसंबर, 1993 को एक कड़ा कदम उठाया। उसने पश्चिम बंगाल में चुनाव करवाए जाने से संबंधित सारी प्रक्रिया रोक दी। आयोग ने साफ कर दिया कि अगर पश्चिम बंगाल सरकार मतदाताओं को पहचान पत्र देने संबंधी प्रक्रिया शुरू नहीं करती है तो राज्य में कोई चुनाव नहीं करवाया जाएगा।
आयोग के इस आदेश का तत्काल असर राज्य सभा के लिए पांच सांसदों के चुनाव पर पड़ने वाला था। राज्य सरकार ने 13 जनवरी, 1994 को इस आदेश को कोर्ट में चुनौती दी। लेकिन, कोर्ट में उसने कहा कि राज्य सरकार सिद्धांत रूप में वोटर आईडी कार्ड जारी करने के आदेश से सहमत है। इसके तुरंत बाद शेषन ने राज्य सभा चुनाव करवाने की प्रक्रिया शुरू की।
ममता बनर्जी तब कांग्रेस में थीं। उन्होंने चुनाव आयोग के फैसले का पूरा समर्थन किया था। टीएन शेषन ने आत्मकथा 'थ्रू द ब्रोकेन ग्लास' में लिखा है कि ममता पश्चिम बंगाल में 'वोटर कार्ड नहीं तो चुनाव नहीं' का अभियान चलाने वाली थीं।
शेषन ने बंगाल में चुनाव के बारे में लिखा है कि तब बंगाल चुनावी हिंसा और गड़बड़ियों के लिए बदनाम था। 42 में 36 निर्वाचन क्षेत्र संवेदनशील या अति संवेदनशील की कैटेगरी में रखे गए थे। मुख्यमंत्री ज्योति बसु इससे खफा रहते थे। वह इसे राज्य की जनता का अपमान बताते थे।
शेषन ने बोगस वोटिंग रोकने के मकसद से वोटर आईडी कार्ड का आइडिया दिया था। उन्होंने लिखा है कि आंध्र प्रदेश के एक मंत्री के घर के पते पर 300 मतदाताओं के नाम थे। आंध्र प्रदेश में ही एक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या उस क्षेत्र की कुल आबादी से ज्यादा थी।
Updated on:
18 Sept 2026 03:25 pm
Published on:
21 Apr 2026 06:55 pm
