
आखिर क्या थी फूलन देवी कि ख़्वाहिश? जब कहा था- मरने के बाद जन्म हो तो लंदन जैसी जगह में हो (AI जनरेटेड इमेज)
Phoolan Devi Story: साल था 1992। जून का गरम महीना। दस्यु सुंदरी कही जाने वालीं फूलन देवी उन दिनों ग्वालियर सेंट्रल जेल में सजा काट रही थीं। रॉय मोक्स्हम ने कुछ ही दिन पहले एक अखबार में फूलन की कहानी पढ़ी थी। फूलन ने अपने बलात्कार का बदला लेने के लिए अगड़ी जाति के 22 लोगों का कत्ल कर 1983 में आत्मसमर्पण किया था। सरकार से डील हुई थी कि आठ साल से ज्यादा जेल में नहीं रखा जाएगा। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। मोक्स्हम ने जेल में फूलन के नाम एक चिट्ठी भेज दी। इसमें उनकी मदद का प्रस्ताव था।
फूलन उन दिनों चुनाव लड़ रही थीं, जो वह हार गईं। मोक्स्हम को अखबारों से इस हार का पता चला। फूलन से उनकी सुहानूभूति और बढ़ गई। तभी फूलन देवी पर लिखी माला सेन की किताब (India’s Bandit Queen – the True Story of
Phoolan Devi)उनके हाथ लग गई। वह पूरी रात किताब पढ़ते रहे। किताब में फूलन की गरीबी, जुल्म और अपराध की दुनिया में आने की कहानी पढ़ कर उनकी हमदर्दी और बढ़ गई।
इधर, 30 जून को मोक्स्हम को एक ग्वालियर से आया एक खत मिला। वह खत हिंदी में था, इसलिए वह पढ़ नहीं सके। करीब 15 दिन बाद एक और खत आया। लेकिन, फिर वही भाषा की समस्या। एक दिन मोक्स्हम अपने कुछ साथियों के साथ पब गए तो वहां उन्हें कुछ एशियाई दिखे। उन्हें लगा हो सकता है उनमें से कोई हिंदी जानता हो। वहां जाकर उन्होंने खत दिखाया तो पता चला कि फूलन देवी ने लिखा है।
फूलन ने खत में आभार जताते हुए अपनी परेशानी बताई थी और लिखा था कि भारत में औरतों के साथ बहुत बुरा बर्ताव होता है। आगे पढ़ते हुए पढ़ने वाले शख्स के चेहरे पर गुस्सा नजर आ रहा था। कुछ गड़बड़ न हो, इसलिए मोक्स्हम फौरन वहां से भाग गए। लेकिन, अब उन्हें हर कीमत पर खत का पूरा अनुवाद चाहिए था। पर तमाम कोशिशों के बावजूद यह हो नहीं पा रहा था। अंत में एक एशियाई रेस्तरां के वेटर की मदद से उन्होंने खत का मजमून जाना।
ग्वालियर जेल से 29 जून, 1992 को वह खत लिखा गया था। फूलन ने शुक्रिया जताते हुए लिखा था- मुझ जैसी औरत को आपने जो इज्जत दी है, उसे पाकर मैं अपनी खुशी शब्दों में बयां नहीं कर सकती। मैं गरीब, बेसहारा हूं। जो थोड़े बहुत पैसे थे वे चुनाव में खर्च हो गए। कोर्ट फी के लिए पैसे नहीं हैं और भारत में वकील बड़े महंगे हैं। यहां औरतों की कोई सुनता नहीं है। उन्हें इंसाफ दिलाने की फिक्र किसी को नहीं है। कभी-कभी तो मैं भगवान को कोसती हूं कि मुझे भारत में पैदा ही क्यों किया! मरने के बाद मेरा फिर से जन्म हो तो लंदन या वैसी ही किसी जगह में हो, जहां औरतों को बराबरी का दर्जा मिलता हो। मुझे नहीं लगता कि मैं कभी इंसाफ हासिल कर पाऊँगी। आपसे जितना बन सके, मेरी मदद कीजिए। बड़ी मेहरबानी होगी, अगर आप वहां अखबारों में अपील छपवा सकें कि हर भाई-बहन एक दिन के सिगरेट का खर्च मुझ लाचार की मदद के लिए दान करे। आपकी बड़ी कृपा होगी। फिर मैं अपने और किसी भी औरत पर हुए जुल्म के खिलाफ लड़ पाऊँगी।
इसके बाद मोक्स्हम ने फूलन की मदद के लिए पैसे जुटाने का काम शुरू किया। कई दोस्त मदद के लिए आगे आए। कुछ ने मज़ाक भी उड़ाया। लेकिन, मोक्स्हम ने सौ पॉन्ड जुटा कर पोस्टल ऑर्डर के जरिए फूलन को भेजे।
लेकिन, 1 सितंबर, 1992 को फूलन की ओर से आई एक चिट्ठी ने मोक्स्हम को हैरान कर दिया। डॉ. अब्दुल माजिद ने खुद को फूलन का भाई बताते हुए यह चिट्ठी लिखी थी। इसमें उन्होंने लिखा था कि फूलन की ज़िंदगी के दुश्मन कई लोग भारत सरकार की कैबिनेट (उस समय नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे) में बैठे हैं। ऐसे में फूलन के लिए जेल से बाहर आना खतरनाक होगा। हमारे लिए उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना आसान नहीं होगा। हम कभी विदेश नहीं गए हैं, इसलिए आपकी कृपा चाहते हैं।
इस खत को पढ़ कर मोक्स्हम को लगा कि अगर बाहर जान का खतरा है तो फूलन की रिहाई के लिए कोशिश करना बेमानी है। उन्होंने डॉ माजिद को लिखा कि ब्रिटिश सरकार फूलन को शरणार्थी के रूप में रहने की इजाजत शायद ही दे।
अक्तूबर में मोक्स्हम ने फूलन को भी खत लिखा। इसमें उन्होंने पूछा कि उनके भेजे पैसे मिले या नहीं? कोई वकील रखा या नहीं? साथ ही माजिद की चिट्ठी की बारे में भी बताया और यह भी कहा कि ब्रिटिश सरकार उन्हें लंदन में रहने की इजाजत नहीं देगी।
मोक्स्हम ने दिसंबर में भारत आने का प्लान बनाया। इससे पहले अक्तूबर में फूलन का जवाब आया, जिसमें उन्होंने कामिनी जायसवाल को वकील नियुक्त करने की जानकारी दी और धर्म परिवर्तन की इच्छा जताते हुए इस बारे में सलाह भी मांगी। अब मोक्स्हम को भारत आने की और जल्दी होने लगी। उनके तय कार्यक्रम से एक सप्ताह पहले अयोध्या में विवादित ढांचा ढहा दिए जाने की खबर मिली। यह खबर सुन कर मोक्स्हम को समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे हालात में जाना ठीक रहेगा या नहीं, लेकिन यात्रा टालना भी मुश्किल था। उनके टिकट के पैसे वापस नहीं मिलने वाले थे और उनके पास पैसों का संकट था। इसलिए वह 13 दिसंबर को भारत के लिए निकल गए।
इस यात्रा और फूलन देवी से संपर्क ही रॉय मोक्स्हम की किताब Outlaw: India's Bandit Queen and Me का आधार बनी। ऊपर का ब्योरा भी इसकी किताब में दर्ज है।
Published on:
10 Aug 2026 06:00 am
