
शिव सेना (यूबीटी) अध्यक्ष उद्धव ठाकरे। (फोटो: ANI)
Shiv Sena Rebellion Crisis : शिव सेना में दो गुटों के बीच टकराव और बगावत के बीच पार्टी के कई नेताओं ने इस गुट से किनारा कर लिया है और दल की हालात अजीब हो गई है। नाराज और भावुक उद्धव ठाकरे के इस्तीफा देने की पेशकश पर शिवसेना नेता मनीषा कायंदे ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस बहाने यूबीटी नेताओं में असंतोष होने की बात कही है।
उन्होंने अंदरूनी बगावत के बीच उद्धव ठाकरे के इस्तीफे की कथित पेशकश पर कहा: 'यह उनकी मर्जी है कि वह पार्टी प्रमुख बने रहना चाहते हैं या नहीं। यूबीटी सदस्यों के बीच असंतोष की एक और वजह यह अटकल है कि वह आदित्य ठाकरे को कार्यकारी अध्यक्ष घोषित कर सकते हैं, जिससे लोग नाराज हैं और यह नेतृत्व का संकट है।
शिव सेना के यूबीटी गुट को 'ऑपरेशन टाइगर' नाम के एक तेज और गुप्त दलबदल अभियान के बाद एक और बड़े सियासी संकट का सामना करना पड़ रहा है। सेना (UBT) के नौ लोकसभा सांसदों में से छह चुपचाप पार्टी से अलग हो गए और स्थानीय लीडरशिप से बचते रहे। पिछले दिनों बागी छह सांसद चार्टर्ड फ्लाइट से नई दिल्ली पहुंचे और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात की।
उन्होंने पत्र सौंप कर कहा कि ठाकरे गुट पार्टी की मूल विचारधारा से भटक गया है और आखिरकार कांग्रेस में विलय करने का इरादा रखता है। चूंकि ये छह सांसद यूबीटी गुट के लोकसभा सदस्यों का दो-तिहाई हिस्सा हैं, इसलिए वे दलबदल विरोधी कानूनों से बचना चाहते हैं। इसके बाद यूबीटी खेमे ने अनुपस्थित सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी किए, जबकि बागी नेताओं को बढ़ी हुई सुरक्षा मिली और उन्होंने सत्ताधारी एनडीए गुट के साथ बैठने की जगह की मांग की।
शिवसेना में बगावत और गुट बनने का सिलसिला सन 2022 में शुरू हुआ, जब एकनाथ शिंदे की अगुवाई में उद्धव ठाकरे की लीडरशिप के खिलाफ बड़ी बगावत हुई थी। यह मामला हाल ही में तब और बढ़ गया जब इस गुट के छह लोकसभा सांसदों ने सत्ताधारी शिंदे गुट में शामिल होने के लिए पार्टी छोड़ दी।
शिव सेना में संकट की शुरुआत जून 2022 में हुई, जब पार्टी के सीनियर नेता एकनाथ शिंदे ने दल के अधिकतर विधायकों के साथ मिलकर तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर दी। इस बगावत की मुख्य वजह कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर 'महा विकास अघाड़ी' गठबंधन बनाने के दौरान पार्टी की विचारधारा में आए बदलाव की वजह से असंतोष था।
दोनों गुटों में तनातनी के बाद एकनाथ शिंदे और उनके समर्थक अलग हो गए, भाजपा के साथ गठबंधन किया और सफलतापूर्वक नई सरकार बनाई, जिसमें शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। सन 2022 के बंटवारे के बाद चुनावी निशान को लेकर एक बड़ी कानूनी और संवैधानिक लड़ाई हुई कि कौन सा गुट 'असली' शिवसेना का प्रतिनिधित्व करता है।
चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद सन 2023 में एकनाथ शिंदे गुट के पक्ष में फैसला सुनाया और उन्हें आधिकारिक तौर पर 'शिवसेना' नाम और 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न दे दिया। उद्धव ठाकरे के गुट का नाम बदलकर शिवसेना 'उद्धव बालासाहेब ठाकरे' या सेना (यूबीटी) कर दिया गया और उन्हें नया चुनाव चिह्न 'जलता हुआ मशाल' अपनाना पड़ा। तब से दोनों गुटों में तनातनी ही चल रही है।
Updated on:
20 Jun 2026, 6:43 PM IST
Published on:
20 Jun 2026, 6:42 PM IST
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