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लालू और नीतीश में क्या है सबसे बड़ा अंतर? शिवानंद तिवारी ने बताया, क्यों सीएम लालू पर तमतमा गए थे नीतीश कुमार

Nitish Kumar: शिवानंद तिवारी एक समय में नीतीश और लालू दोनों के करीबी रहे हैं। इन दिनों वह पुरानी कहानियों को फेसबुक पोस्ट पर लिखते हैं, इस बार उन्होंने बताया कि क्यों सीएम लालू पर तमतमा गए थे नीतीश कुमार...

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समृद्धि यात्रा के दौरान सीएम नीतीश कुमार

आरा में समृद्धि यात्रा के दौरान सीएम नीतीश कुमार (फोटो- X@JDUOnline)

Nitish Kumar's Rajya Sabha Oath:नीतीश कुमार आज राज्य सभा सांसद पद की शपथ लेंगे। करीब दो दशक बाद बिहार की राजनीति धुरी रहे नीतीश एकबार फिर केंद्रीय राजनीति में लौट रहे हैं। उनकी राजनीतिक यात्रा 360 डिग्री घूम गई है। नीतीश को लेकर उनके सहयोगी रहे समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने फेसबुक पोस्ट के जरिए नीतीश की राजनीति का ब्योरा बताया है।

शिवानंद तिवारी , राजद नेता (पूर्व में नीतीश के करीबी रहे और जदयू से राज्य सभा सदस्य रह चुके हैं)

'नीतीश की यात्रा को दो खंडों में देखा जा सकता है'

शिवानंद तिवारी अपने फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं, 'नीतीश की राजनीति की संपूर्ण यात्रा दो खंड में देखा जा सकता है। पहला खंड वह है, जब वह सत्ता के बाहर थे। नीतीश कुमार पहली बार साल 1985 में विधानसभा सदस्य बने। उसके बाद तो उनकी राजनीति सरपट दौड़ी। 1989 में बाढ़ संसदीय क्षेत्र से सांसद बने। 1990 में वीपी सिंह की सरकार में कृषि और सहकारिता राज्यमंत्री बने। वह सरकार सिर्फ पंद्रह महीने ही चल पाई। 1991 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में नीतीश जी पुनः बाढ़ से सांसद बने।

1990 लालू यादव बन चुके थे CM

इस बीच 1990 में लालू यादव मुख्यमंत्री बन चुके थे। मंडल आयोग की अनुशंसाओं को लागू किए जाने के समर्थन में उनके अभियान और आडवाणी जी की गिरफ्तारी से उनकी लोकप्रियता आसमान छू रही थी। हालांकि उस अभियान में लालू यादव के साथ नीतीश कुमार सहित हम सब लोग सक्रिय थे।

शिवानंद तिवारी ने आगे लिखा कि 1991 की लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद की एक चर्चित घटना है। चर्चित इस अर्थ में कि कई लोगों ने उस घटना के बारे में अपने-अपने तरीके से लिखा है। संकर्षण ठाकुर की किताब में शायद वह घटना सबसे पहले आई थी। मैंने उसको पढ़ा नहीं है, लेकिन वह घटना लालू और नीतीश दोनों के मिजाज और चरित्र को जरूर दर्शाती है।

बिहार भवन में फिल्म देख रहे थे नीतीश

शिवानंद तिवारी ने लिखा कि साल 1991 के मध्यावधि चुनाव में वृष्णि पटेल भी सिवान संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतकर लोकसभा आए थे। बिहार भवन में उनको कमरा मिला था। दिल्ली में उन दिनों मेरा मुकाम नीतीश का ही घर हुआ करता था। जिस दिन की यह घटना है, उस दिन हम लोग यानी नीतीश कुमार, ललन सिंह, वृष्णि पटेल और मैं पटेल साहब के कमरे में टेलीविजन पर कोई फिल्म देख रहे थे।

फिल्म के समाप्त होने के बाद जब हम बाहर निकले, तो पता चला कि लालू यादव भी दिल्ली आ गए हैं और नीचे मुख्यमंत्री कक्ष में हैं। नीतीश कुमार ने ही कहा कि चलिए, मुख्यमंत्री से मिल लिया जाए, लेकिन ललन पता नहीं क्यों जाने को इच्छुक नहीं थे।

नीतीश को अपनी जमात का नेता मानते थे: शिवानंद तिवारी

नीतीश ने कहा कि 'अरे चलिए. ऐसा क्या है।' लेकिन तब भी ललन जाने में संकोच कर रहे थे। तब मैंने ललन सिंह से कहा कि जब 'नेता' कह रहा है तो चलो, क्या हर्ज है। शिवानंद ने कहा कि हम लोग नीतीश को ही अपनी जमात का नेता मानते थे। यह जयप्रकाश आंदोलन और लोहिया विचार मंच के जमाने से ही था।

हम लोग मुख्यमंत्री कक्ष के ड्राइंग रूम में पहुंचे। वहां देखा कि तीन लोगों के बैठने वाले लंबे सोफे पर बीच में लालू यादव बैठे हुए हैं। सामने एक लंबा टेबल था, जिस पर एक खुली हुई फाइल रखी थी। फाइल में सिर्फ एक पन्ना नजर आ रहा था। लालू यादव के हाथ में खुली हुई कलम थी। उनकी नजर फाइल पर थी। जब हम लोग कमरे में दाखिल हुए तो उन्होंने हम पर नजर भी नहीं उठाई।

तिवारी ने आगे कहा कि हम लोग अंदर गए और जिसे जहां जगह मिली, वहां बैठ गए या खड़े हो गए। एक दूसरा लंबा सोफा था। नीतीश और पटेल साहब उस पर बैठ गए। सामने एक गोदरेज की टेबल थी, जिस पर टेक लगाकर ललन खड़े हो गए। मैं लालू यादव के बगल में रखी कुर्सी पर बैठ गया।

ललन सिंह को उंगली दिखाकर बाहर का रास्ता दिखाया

लालू यादव ने बगैर कुछ कहे, अपनी कलम बंद की, फाइल को एक तरफ रखा और सीधे ललन की ओर देखा और उंगली के इशारे से उसको कमरे से बाहर का रास्ता दिखाया। सब लोग हतप्रभ हो गए। ललन भी पहले उस इशारे को नहीं समझ पाए। तब लालू ने दोबारा उनको बाहर जाने का इशारा किया। ललन चुपचाप सिर झुकाकर वहां से बाहर निकल गए।

मैंने नीतीश कुमार और पटेल साहब के चेहरे की ओर नजर उठाई। ललन के साथ इस व्यवहार को देखकर दोनों का चेहरा उतर गया था। ललन अपनी मर्जी से लालू के यहां नहीं गए थे। एक तरह से नीतीश ही दबाव देकर उनको वहां ले गए थे।

सरयू राय को लेकर गाली-गलौच

इसके बाद लालू यादव ने सरयू राय का नाम लेकर गाली गलौज करना शुरू कर दिया। लालू सरयू राय को क्यों गलिया रहे हैं, इसे लेकर हम लोग इससे बिल्कुल अनभिज्ञ थे। बाद में पता चला कि राय जी ने पटना के नवभारत टाइम्स में एक लेख लिखा था। उन्होंने लालू सरकार पर आरोप लगाया था कि बिहार के हित के विरुद्ध इसने सोन नहर के पानी को भारत सरकार के तत्कालीन बिजली मंत्री कल्पनाथ राय के क्षेत्र में दे दिया है। बिहार विधानसभा का सत्र चल रहा था। विपक्ष ने उस खबर पर विधानसभा में शोरशराबा मचाया था।

नीतीश के बेहद करीबी हैं सरयू राय

सरयू राय नीतीश के बेहद करीबी मित्र हैं। राय को लेकर उस समय लालू यादव अत्यंत आक्रोश में थे। लालू ने सरयू राय पर आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहा कि वे किसी की कृपा से राजनीति नहीं कर रहे हैं। मैं जानता हूं कि यह सब कौन करा रहा है। उनका इशारा नीतीश कुमार की ओर था।

लालू यादव पर गुस्सा हुए शिवानंद तिवारी

शिवानंद तिवारी ने आगे लिखा, 'यह सब सुनकर मेरे धैर्य का बांध टूट गया। मैंने खड़े होकर कहा कि आपको यह गलतफहमी हो गई है कि बाकी लोग आपकी कृपा से राजनीति कर रहे हैं। मैंने उन्हें उनके पुराने दिनों की याद दिलाई और कहा कि मेरे जीप पर पीछे लटकने के लिए बेचैन रहते थे। वह दिन भूल गये! मैंने नीतीश को कहा उठो, इस आदमी के साथ बैठना अपना अपमान करवाना है। गुस्से से मेरी आवाज कांप रही थी। नीतीश और पटेल साहब उठकर खड़े हो गए।'

लालू मुझे अपने स्कूल के दिनों से जानते थे। मेरी इस प्रतिक्रिया से स्थिति अचानक बदल गई। लालू यादव तुरंत उठे, मुझे पकड़कर शांत करने लगे और बाहर आवाज लगाई। “अरे कहां मर गया सब। जल्दी बाबा के लिए चाय ले आओ। दूसरी ओर नीतीश को कहा, बैठिए नीतीश जी, बाबा चाय पी कर जायेंगे। नीतीश ठस से बैठ गए। चाय आई। अब चाय गले के नीचे उतर रही है! किसी तरह चाय गले से नीचे उतार कर हम लोग वहां से बाहर निकले। बिहार भवन के बिलकुल नजदीक ही नीतीश कुमार का सरकारी आवास था। वातावरण गंभीर था। घर पहुंचते ही नीतीश कुमार ने अपने स्टाफ को आदेश दिया कि किसी का फोन नहीं देना है। किसी से मिलना नहीं है। पटना सरयू राय को फोन लगाइए। राय को फोन गया कि शाम जहाज से दिल्ली पहुंचे।

नीतीश ने सरयू राय को लगाया फोन, शरद यादव से मिलने निकले

शाम तक राय जी दिल्ली हाज़िर हो गए। पूरी घटना पर चर्चा हुई। तय हुआ कि बिहार भवन में जो कुछ भी हुआ उसके विरोध में लालू यादव को कड़ी चिट्ठी लिखी जाए। राय जी चिट्ठी का मजमून तैयार करें। दो ढाई पेज का मजमून राय ने तैयार किया। नीतीश कुमार ने राय को सुझाया कि इसको थोड़ा छोटा कर दें। राय ने फिर लिखने में हाथ लगाया। इधर नीतीश ने कहा कि वे शरद यादव से मिल आते हैं। मैंने कहा कि शरद यादव से मिलने जाओगे तब तो चिट्ठी नहीं जाएगी। नीतीश ने झुंझला कर जवाब दिया कि शरद यादव नेता हैं। उनसे क्यों नहीं मिलें।

मैंने जवाब दिया कि जरूर मिलो। मैं तो सिर्फ उस मुलाकात के नतीजे की बात कर रहा हूं। नीतीश शरद यादव से मिल कर आये। इस बीच राय जी ने ढाई पेज को डेढ़ पेज में संक्षिप्त कर दिया था। नीतीश ने कहा कि इसको और छोटा कर दीजिए। इसको पटना पहुंचने के बाद लालू को भेजा जाएगा। अंततोगत्वा समझा जाए कि उस चिट्ठी का कोई औचित्य नहीं रहा, लेकिन वह मूल चिठ्ठी छपी हुई है, श्रीकांत की किताब 'चिठ्ठियों की राजनीति' में।