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Supreme Court Arrest Guidelines: पुलिस किसी को 24 घंटे से ज्यादा अपनी हिरासत में नहीं रख सकती- सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Illegal Police Detention: कानून की नजर में अब गिरफ्तारी का समय सिर्फ पुलिस रिकॉर्ड से तय नहीं होगा। व्यक्ति की स्वतंत्रता जिस पल सीमित हुई, उसी क्षण से संवैधानिक समयसीमा लागू मानी जाएगी।
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भारत

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Manoj Vashisth

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Updated: 5 Nov 2026, 12:45 PM IST

Supreme Court 24 Hour Arrest Rule

Supreme Court 24 Hour Arrest Rule (PC: ANI)

Supreme Court 24 Hour Arrest Rule: पुलिस हिरासत में किसी व्यक्ति की आजादी कब से छीनी गई, अब यही सवाल उसकी रिहाई का आधार बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से जुड़े नियमों की व्याख्या करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समयसीमा पुलिस के गिरफ्तारी संबंधी कागज तैयार करने से नहीं, बल्कि वास्तविक हिरासत से शुरू होगी। इस फैसले ने उन परिस्थितियों पर कानूनी सवाल खड़े किए हैं, जहां किसी व्यक्ति को पहले रोककर रखा जाता है और बाद में औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज की जाती है। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि कस्टोडियल हिंसा देश की दुर्भाग्यपूर्ण वास्तविकता है, जिसे न्यायपालिका भी स्वीकार करती है।

इस फैसले की अहमियत बस इतनी नहीं कि ये कानून में एक लाइन जोड़ता है, बल्कि कोर्ट ने साफ कर दिया है कि असली गिरफ्तारी कब शुरू हुई इस सच को देखना जरूरी है, सिर्फ कागजों की तारीख-समय गिनना काफी नहीं। अब हिरासत की अवधि निर्धारित करते समय पुलिस दस्तावेजों के साथ उन वास्तविक परिस्थितियों को भी महत्व देना होगा, जिनमें व्यक्ति को अपनी इच्छा से जाने की अनुमति नहीं थी।

संविधान देता है गिरफ्तारी के खिलाफ सुरक्षा

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 22(2) बहुत साफ शब्दों में कहता है अगर पुलिस किसी को गिरफ्तार करती है, तो 24 घंटे के भीतर उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना ही होगा। रास्ते में लगने वाला समय अलग है, पर असल बंदी बनाने के वक्त से ये घड़ी चलनी चाहिए।

Supreme Court 24 Hour Arrest Rule: कोर्ट ने एक मिसाल भी दी

अगर कोई सुबह 8 बजे से पुलिस के कब्जे में है, और गिरफ्तारी दोपहर में दर्ज हुई, तो 8 बजे से ही 24 घंटे की गिनती मानी जाएगी। पुलिस अगर कागजी गिरफ्तारी देर से भी दिखाए, तो उससे हिरासत की कुल अवधि ज्यादा नहीं हो सकती।

कोर्ट यहीं नहीं रुका। उसने साफ कहा-पुलिस के पास 24 घंटे की पूरी छूट नहीं है। BNSS की धारा 58 कहती है कि पकड़े गए व्यक्ति को बेमतलब की देरी के बिना, जल्दी से जल्दी मजिस्ट्रेट के सामने हाजिर करना है। यानी हालात के मुताबिक पुलिस को इससे भी पहले पेश करना पड़ सकता है। साथ ही, हर केस में हिरासत सिर्फ जरूरत भर ही दी जानी चाहिए, ज्यादा समय तक नहीं।

मजिस्ट्रेट की भूमिका भी होगी अहम

मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी भी अब ज्यादा है। पुलिस जब किसी को लेकर उसके पास आए, तो वह खुद नोट करेगा कि हिरासत कब से शुरू मानी जाए। और देखेगा कि क्या सही वक्त में व्यक्ति कोर्ट में लाया गया या नहीं। अगर 24 घंटे का उल्लंघन दिखा, तो फौरन रिहा करने का हुक्म देना होगा। इस तरह कोर्ट ने खुद न्यायिक निगरानी को एक कदम आगे कर दिया है।

आखिर, ये फैसला क्यों जरूरी है?

असल में पुलिस हिरासत में लिए गए किसी भी आदमी के अधिकार यहां से मजबूत होते हैं। उसकी रिहाई, उसके घरवालों की जानकारी, पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता इन सबके लिए अब एक ठोस आधार होगा। अब कोर्ट ने रिकॉर्ड और असलियत, दोनों को बराबर महत्व देने की बात रखी है।