
सुप्रीम कोर्ट (सोर्स: ANI)
Internal Injuries: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एसिड अटैक सर्वाइवर्स के अधिकारों का दायरा बढ़ा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एसिड हमले में केवल बाहरी या चेहरे का जलना ही नुकसान नहीं है, बल्कि जिन पीड़ितों को अंदरूनी चोटें आई हैं, वे भी दिव्यांगता कानून के तहत लाभ पाने के पूरी तरह हकदार हैं। इस फैसले से उन सैकड़ों पीड़ितों को न्याय मिला है, जो अब तक सरकारी लाभ से वंचित थे।
इससे पहले, 'दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016' के तहत आमतौर पर उन एसिड अटैक सर्वाइवर्स को दिव्यांगता प्रमाणपत्र जारी किया जाता था, जिनके शरीर का बाहरी हिस्सा, चेहरा या त्वचा गंभीर रूप से झुलस गई हो। लेकिन कई बार एसिड निगलने या हमले के दौरान तेजाब शरीर के अंदर जाने से श्वासनली, भोजन नली, फेफड़ों या आंखों की रोशनी को अपूरणीय क्षति पहुंचती है, जो बाहर से नहीं दिखती। अदालत ने माना कि ऐसी अदृश्य चोटें व्यक्ति के सामान्य जीवन और कार्यक्षमता को बुरी तरह प्रभावित करती हैं, इसलिए उन्हें भी कानून के दायरे में लाना अनिवार्य है।
शीर्ष अदालत की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि तेजाब का हमला केवल एक शारीरिक अपराध नहीं है, बल्कि यह पीड़ित के पूरे जीवन को झकझोर देता है। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य पीड़ितों को पुनर्वास और समाज में समान अवसर प्रदान करना है। अगर किसी सर्वाइवर के आंतरिक अंगों को नुकसान पहुंचा है, तो मेडिकल बोर्ड को उनकी जांच कर उन्हें दिव्यांगता का दर्जा देना होगा, ताकि वे भी आरक्षण और सरकारी सहायता का लाभ उठा सकें।
इस फैसले के बाद, अब उन पीड़ितों को बड़ी राहत मिलेगी जो बाहरी रूप से ठीक दिखते हैं लेकिन तेजाब के कारण शरीर के अंदर गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं। उन्हें अब सरकारी नौकरियों में दिव्यांग कोटा, इलाज के लिए भत्ते और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिल सकेगा।
यह कदम न केवल न्यायपालिका की संवेदनशीलता दर्शाता है, बल्कि समाज में उन पीड़ितों के प्रति नजरिया बदलने का भी काम करेगा जो लंबे समय से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, कानूनी विशेषज्ञों और एसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए काम करने वाले तमाम एनजीओ ने खुले दिल से स्वागत किया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह एक 'मील का पत्थर' है जो पीड़ितों के सम्मानजनक पुनर्वास में अहम भूमिका निभाएगा।
इस आदेश के बाद अब केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को अपने स्वास्थ्य विभागों और मेडिकल बोर्ड्स को नई गाइडलाइन जारी करनी होगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकारें कितनी जल्दी इस आदेश को लागू कर अंदरूनी चोटों वाले पीड़ितों को प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया शुरू करती हैं।
समाज में अक्सर यह धारणा होती है कि एसिड अटैक का मतलब सिर्फ चेहरा खराब होना है। लेकिन इस फैसले ने लोगों का ध्यान उन 'अदृश्य घावों' की ओर खींचा है जो पीड़ित जीवन भर सहते हैं। यह फैसला बताता है कि असली पुनर्वास तभी संभव है जब पीड़ित को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाया जाए और उन्हें रोजगार के उचित अवसर मिलें। (इनपुट:ANI)
Published on:
04 May 2026 09:22 pm
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