
Muslim Polygamy Ban :बहुविवाह पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तेज, केंद्र को जारी हुआ नोटिस (फोटो सोर्स: @ians_india)
Supreme Court Polygamy Case: देश में मुस्लिम समुदाय के भीतर सदियों से चली आ रही बहुविवाह (Polygamy) की प्रथा पर अब कानूनी शिकंजा कसने लगा है। शीर्ष अदालत (Supreme Court) ने सामाजिक कार्यकर्ता और भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (BMMA) की सह-संस्थापक जाकिया सोमन द्वारा दायर एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता श्रिया मैनी ने कोर्ट रूम के बाहर बताया कि यह याचिका महज प्रथाओं के विरोध की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उन हजारों महिलाओं के सम्मान और भरण-पोषण से जुड़ी न्याय की पुकार है जो एक से अधिक शादियों के कारण मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलने को मजबूर हैं।
याचिका में तर्क दिया गया है कि संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव के खिलाफ अधिकार) और अनुच्छेद 21 (सम्मान से जीने का अधिकार) हर नागरिक को समान सुरक्षा की गारंटी देता है।
अधिवक्ता श्रिया मैनी के अनुसार, इस याचिका के जरिए शीर्ष अदालत के सामने चार प्रमुख मांगें रखी गई हैं:
विवाह और तलाक का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन: हिंदू मैरिज एक्ट और देश के अन्य नागरिक कानूनों की तर्ज पर मुस्लिम शादियों और तलाक के लिए भी एक पारदर्शी रजिस्ट्रेशन व्यवस्था लागू की जाए।
बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध: मुस्लिम पुरुषों द्वारा किए जाने वाले बहुविवाह (एक से अधिक शादियों) की प्रथा को पूरी तरह से असंवैधानिक घोषित कर समाप्त किया जाए।
BNS की धारा 82 का दायरा: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 (जो पहले IPC की धारा 494 थी और द्विविवाहित होने पर सजा का प्रावधान करती है) के तहत मुस्लिम बहुविवाह को भी अवैध ठहराया जाए।
महिलाओं के लिए विशेष फंड: प्रभावित पहली और दूसरी पत्नियों के तत्काल वित्तीय संरक्षण और अंतरिम सहायता के लिए एक समर्पित सरकारी फंड (सहायता कोष) गठित किया जाए।
"यह लड़ाई किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि महिलाओं के सम्मान और कानूनी बराबरी के लिए है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मिलने वाली असीमित छूट के कारण महिलाओं और बच्चों को सामाजिक व आर्थिक बेदखली झेलनी पड़ती है।" जाकिया सोमन, याचिकाकर्ता
गौरतलब है कि वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक साथ तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद से ही बहुविवाह और 'निकाह हलाला' जैसी प्रथाओं पर कानूनी तलवार लटकी हुई थी। हाल के दिनों में असम जैसे राज्यों द्वारा बहुविवाह पर रोक लगाने के लिए पेश किए गए राज्यस्तरीय विधेयकों और उत्तराखंड में लागू हुए समान नागरिक संहिता (UCC) ने इस बहस को राष्ट्रीय स्तर पर और तेज कर दिया है।
Updated on:
31 Jul 2026 12:46 pm
Published on:
31 Jul 2026 12:32 pm
