19 फ़रवरी 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

मुफ्त की स्कीमों पर सुप्रीम कोर्ट ने पार्टियों को लगाई फटकार, कहा- खैरात नहीं रोजगार दो

Political Freebies:सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा बांटे जाने वाले मुफ्त उपहारों (Freebies) पर कड़ी चिंता जताई है। अदालत का साफ तौर पर कहना है कि ऐसी घोषणाएं देश की अर्थव्यवस्था और भविष्य के विकास के लिए बेहद नुकसानदायक हैं।

2 min read
Google source verification

भारत

image

MI Zahir

Feb 19, 2026

Supreme Court India

सुप्रीम कोर्ट की सरकार को फटकार। (फोटो: पत्रिका)

Economic Development: देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव जीतने के लिए मुफ्त उपहार (Freebies) बांटने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस तरह की मुफ्त घोषणाओं से देश के Economic Development (आर्थिक विकास) में बड़ी बाधा उत्पन्न हो रही है। अदालत ने इस मुद्दे को एक गंभीर आर्थिक और लोकतांत्रिक समस्या बताया है। न्यायालय के अनुसार, चुनाव के समय राजनीतिक दल बिना किसी ठोस आर्थिक योजना के लोकलुभावन वादे कर देते हैं। इसका सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है। जब सरकार का बजट इन मुफ्त की योजनाओं में खर्च हो जाता है, तो आधारभूत ढांचे (Infrastructure), स्वास्थ्य, और शिक्षा जैसे जरूरी क्षेत्रों के विकास के लिए पैसा नहीं बचता। इसका अंतिम नुकसान आम करदाता (Taxpayer) को ही उठाना पड़ता है।

चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल

इस मामले की सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि सिर्फ राजनीतिक दलों को दोष देना काफी नहीं है, बल्कि इस पर लगाम लगाने के लिए एक स्पष्ट नीति की जरूरत है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि इस 'Freebies Culture' को नियंत्रित करने के लिए चुनाव आयोग (Election Commission) और केंद्र सरकार को मिलकर एक व्यापक दिशा-निर्देश (Guidelines) तैयार करने चाहिए।

विकास बनाम लोकलुभावन नीतियां

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने देश में एक बड़ी बहस छेड़ दी है। अदालत का मानना है कि जनता को सशक्त बनाने और उन्हें मुफ्त की चीजें देकर उन पर निर्भर बनाने के बीच एक बड़ा अंतर है। सही मायने में आर्थिक विकास तब होता है जब रोजगार के अवसर पैदा हों और आधारभूत सुविधाएं मजबूत हों, न कि सिर्फ चुनाव जीतने के लिए सरकारी खजाने को खाली कर दिया जाए। यह टिप्पणी देश की राजनीति में दूरगामी बदलाव ला सकती है।

आर्थिक विशेषज्ञों और आम जनता की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद आर्थिक विशेषज्ञों और आम जनता की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। अर्थशास्त्रियों ने अदालत के इस रुख का स्वागत किया है और कहा है कि इससे राज्यों को कर्ज के जाल में फंसने से बचाया जा सकेगा। वहीं, कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 'मुफ्त उपहार' और 'गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाओं' के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए, ताकि जरूरतमंदों को नुकसान न हो।

सबकी निगाहें चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के अगले कदम पर

इस मामले में अब सबकी निगाहें चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चुनाव आयोग राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों (Manifestos) में मुफ्त वादों को लेकर कोई सख्त नियम लागू करता है या नहीं। अदालत ने एक विशेषज्ञ समिति बनाने का भी सुझाव दिया है जो इस पूरे मुद्दे का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी।

'कल्याणकारी राज्य (Welfare State) बनाम मुफ्त की रेवड़ियां (Freebies)' की बहस

इस खबर का सबसे बड़ा साइड एंगल 'कल्याणकारी राज्य (Welfare State) बनाम मुफ्त की रेवड़ियां (Freebies)' की बहस है। भारत जैसे विकासशील देश में जहां एक बड़ा वर्ग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करता है, वहां शिक्षा, राशन और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं देना सरकार की जिम्मेदारी है। चुनौती यह तय करने की है कि कौन सी योजना वास्तविक 'कल्याण' है और कौन सी महज वोट बैंक के लिए 'रिश्वत'।