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हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए, कोर्ट जरूरी धार्मिक रीति-रिवाजों के मापदंड तय नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को केरल के सबरीमला मंदिर मामले से जुड़ी रिव्यू पिटीशन (Sabarimala Review Petition) पर सुनवाई हुई। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने धार्मिक रीति-रिवाजों के मापदंड पर अहम टिप्पणी की है।

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भारत

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Vinay Shakya

Apr 23, 2026

supreme Court

सुप्रीम कोर्ट (File Photo)

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सबरीमला रिव्यू पिटीशन (समीक्षा याचिका) पर सुनवाई हुई। इस केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक रीति-रिवाजों पर बड़ी टिप्पणी की है। सुनवाई के दौरान SC ने हिंदू समाज में एकता की अपील की और 'वे हमारे मंदिर नहीं आ सकते और हम उनके मंदिर नहीं जा सकते' जैसे बांटने वाले रवैये के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी।

कोर्ट धार्मिक रीति-रिवाजों के मापदंड तय नहीं कर सकते

सबरीमला समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा- किसी न्यायिक मंच के लिए किसी धार्मिक पंथ की आवश्यक और गैर-आवश्यक प्रथाओं में अंतर करने वाले मापदंडों को परिभाषित करना अत्यंत कठिन है। कोर्ट की बेंच ने कहा कि अगर कोई खास धार्मिक हिंदू पंथ कुछ रीति-रिवाजों को मानता है तो उन सभी को जरूरी धार्मिक रीति-रिवाज नहीं कहा जा सकता है।

अगर वे रीति-रिवाज नैतिकता, सार्वजनिक आदेश और स्वास्थ्य पर असर डालते हैं तो संविधान के तहत, किसी भी धर्म के किसी खास पंथ के धार्मिक रीति-रिवाज तब तक सुरक्षित हैं, जब तक कि वे नैतिकता, पब्लिक ऑर्डर और हेल्थ के खिलाफ न हों। बेंच ने स्पष्ट किया कि कोर्ट धार्मिक रीति-रिवाजों के मापदंड तय नहीं कर सकते हैं।

9 जजों की बेंच कर रही सुनवाई

केरल के सबरीमला मंदिर समेत धार्मिक जगहों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और कई धर्मों द्वारा अपनाई जाने वाली धार्मिक आजादी के दायरे और दायरे से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है। इन मामलों पर 9 जजों की संवैधानिक बेंच सुनवाई कर रही है। इस बेंच में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बी. वी. नागरत्ना, एम. एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

कोर्ट में तीखी बहस

सुप्रीम में लंबित मामले की सुनवाई के दौरान सीनियर वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि धर्म का एक जरूरी हिस्सा भावनाएं हैं और धर्म भावनाएं को आकर्षित करता है। द्विवेदी ने दलील दी- लोग किसी खास धार्मिक ग्रुप, किसी खास मंदिर से जुड़े होते हैं। अगर उस भावना को ठेस पहुंचती है तो वे बहुत जोरदार प्रतिक्रिया करते हैं। इसलिए अदालतों को बहुत धीरे-धीरे, सॉफ्ट और हल्के टच वाले न्यायिक समीक्षा के साथ काम करना होगा।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा- हिंदू समाज को एक होना चाहिए। हम यह नहीं कह सकते कि हम एक समूह के हैं। वे दूसरे समूह के हैं, वे हमारे मंदिर में नहीं आ सकते, हम उनके मंदिर नहीं जा सकते हैं। यह आइडिया नहीं हो सकता। अगर वे मंदिर दूसरों के लिए नहीं खोलेंगे तो समूह को नुकसान होगा।

बेंच की टिप्पणी पर वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा- अगर राज्य चाहता है कि दूसरे समूह के लोगों को भी इजाजत दी जाए तो वह सुधार का कानून बना सकता है। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर आप इजाजत दे रहे हैं तो इजाजत देने वाले कानून की कोई जरूरत नहीं है। साल 1950 में क्या स्थिति थी? बहिष्कार की सामाजिक बुराई थी। इसलिए, इसे हिंदुओं के सभी क्लास और सेक्शन के लिए पब्लिक कैरेक्टर के हिंदू धार्मिक संस्थान खोलने के तौर पर जोड़ा गया।