
प्रस्तुति के लिए इस्तेमाल की गई ट्रेन की तस्वीर। (फाइल फोटो- पत्रिका)
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे को अहम सलाह दी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यात्रियों को 'सेकंड क्लास पैसेंजर' कहना अब ठीक नहीं है। कोर्ट ने इसे संविधान की समानता की भावना के खिलाफ बताया है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह की बेंच ने साफ कहा कि क्लास का नाम सिर्फ कोच पर लगे, व्यक्ति पर नहीं। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि भारत में वर्ग विभेद का लंबा इतिहास रहा है। ऐसे में यात्री को 'सेकंड क्लास' कहना आहत करने वाला है।
बेंच ने राय दी कि किराए के आधार पर भले ही फर्क हो, लेकिन भाषा में यात्री को नीचा नहीं दिखाना चाहिए। कोर्ट ने इसे 'संविधान की आत्मा के खिलाफ करार दिया।
यह टिप्पणी एक दुखद हादसे के बाद दर्ज हुई केस में आई। छत्तीसगढ़ के रायपुर से अहमदाबाद जा रहे चंद्रकांत ठक्कर 28 नवंबर 2015 को ट्रेन नंबर 12834 से यात्रा कर रहे थे।
ट्रेन से वे गिर गए और उनकी मौत हो गई। उनकी पत्नी लता ने मुआवजे के लिए लड़ाई लड़ी, लेकिन रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दावा खारिज कर दिया। इसका कारण था - टिकट नहीं मिला, इसलिए साबित नहीं हो सका कि वे वैध यात्री थे।
सुप्रीम कोर्ट ने एमपी हाई कोर्ट के के फैसले को गलत ठहराया। कोर्ट ने कहा कि टिकट न मिलने भर से यह नहीं माना जा सकता कि यात्री बिना टिकट था। दावेदार को बस एक एफिडेविट देना काफी है, उसके बाद बोझ रेलवे पर आ जाता है।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सबूत का स्तर 'बियॉन्ड रीजनेबल डाउट' नहीं बल्कि 'प्रेपॉन्डेरेंस ऑफ प्रोबेबिलिटी' होना चाहिए। कोर्ट ने रेलवे कानून की मुआवजा वाली धाराओं को 'मानवीय' बताया और कहा कि इन्हें उदारता से लागू करना चाहिए।
कोर्ट ने रेलवे मैनुअल का जिक्र करते हुए कहा कि स्टेशन मास्टर, गार्ड और टीटीई की जिम्मेदारियां साफ हैं, लेकिन अमल कमजोर है।
फिर भी कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ रेलवे को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यात्री भी फुटबोर्ड पर चढ़ना, भीड़भाड़ में जोखिम लेना जैसी आदतें छोड़ें।
कोर्ट ने कहा- दर्दनाक हादसों के बावजूद लोग अपनी आदतें नहीं बदल रहे। अंत में सुप्रीम कोर्ट ने लता को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश रेलवे को दिया। इसे चार हफ्ते में चुकाना होगा।
Updated on:
17 Jul 2026 05:58 pm
Published on:
17 Jul 2026 05:57 pm
