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बंगाल चुनाव 2026: नंदीग्राम विधानसभा सीट पर पूरे देश की नजर, वफादारी की राख से उपजी बगावत की ‘नई आग’

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Elections) के पहले चरण के लिए 23 अप्रैल को मतदान होगा। बंगाल चुनाव (Bengal Elections) में इस बार नंदीग्राम विधानसभा सीट (Nandigram Assembly Seat) काफी चर्चा में है। क्या कहती है इस क्षेत्र की ग्राउंड रिपोर्ट, आइए जानते हैं…

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West Bengal Elections

पश्चिम बंगाल चुनाव: नंदीग्राम विधानसभा सीट की ग्राउंड रिपोर्ट

West Bengal Assembly Elections 2026: बंगाल की राजनीतिक चर्चा नंदीग्राम के बिना अधूरी है। यहां की गर्म हवाओं और उमस में फिर से 2007 जैसी चुनावी तपिश महसूस हो रही है। फर्क बस इतना है कि इस बार की लड़ाई दलों से ज्यादा अपनों के बीच सिमट गई है, जिसने मुकाबले को और रोमांचक बना दिया है।

चुनाव में ग्लैमर बनाम जमीनी ताकत का तड़का

नंदीग्राम की गलियों में धूल उड़ रही है और नारों का शोर चरम पर है। चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में भाजपा ने अपनी फायरब्रांड स्टार प्रचारक और सांसद कंगना रनौत को उतारकर मुकाबले को ग्लैमर और आक्रामकता दोनों दे दी है। कंगना की रैलियों में उमड़ी भीड़, खासकर युवाओं की मौजूदगी, यह संकेत देती है कि पार्टी हिंदू गौरव और परिवर्तन के मुद्दों को धार दे रही है। दूसरी ओर अपनी जमीन वापस पाने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल सांसद अभिषेक बनर्जी ने यहां पूरी ताकत झोंक दी है।

दाहिना हाथ बन गया चुनौती

बंगाल विधानसभा चुनाव (Bengal Assembly Elections) में इस बार नंदीग्राम की लड़ाई 2021 से अलग है। उस समय मुकाबला ममता बनर्जी बनाम शुभेंदु अधिकारी था, लेकिन 2026 में तस्वीर बदल गई है। अब शुभेंदु अधिकारी को चुनौती उनके ही पूर्व करीबी और चुनाव प्रबंधक रहे पवित्र कर दे रहे हैं। कभी दाहिना हाथ कहे जाने वाले पवित्र कर अब TMC के टिकट पर अपने ही पूर्व गुरु के खिलाफ खड़े हैं। उनका कहना है कि अपमान और उपेक्षा ने उन्हें बगावत के लिए मजबूर किया और अब यह लड़ाई नंदीग्राम के स्वाभिमान की है। शुभेंदु अधिकारी के लिए यह चुनाव सिर्फ सीट बचाने का नहीं, बल्कि साख का सवाल है। वे नंदीग्राम के साथ भवानीपुर में भी ममता बनर्जी को चुनौती दे रहे हैं। यहां जीत उन्हें बड़े राजनीतिक कद की ओर ले जा सकती है।

क्या कहती है जनता?

हल्दिया पोर्ट से हाबड़ा नदी पार करते ही चाय के ढाबों और मछली मंडियों में चर्चा सिर्फ दलबदल की नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरतों की भी है। स्थानीय लोगों के बीच पवित्र कर को लेकर खास चर्चा है और कई लोग उन्हें अब भी अधिकारी परिवार का वफादार मानते हैं। पुलिस केस और अदालती कार्रवाइयों का डर यहां बड़ा मुद्दा है, जिसे TMC अपने पक्ष में साधने की कोशिश कर रही है। वहीं, बेरोजगारी और पलायन की समस्या भी गहरी है।

हल्दिया जैसे औद्योगिक क्षेत्र के पास होने के बावजूद युवाओं को काम के लिए बाहर जाना पड़ता है। पान के किसान और मछली पालक आज भी सिंचाई और सही दाम के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सियासी गणित में ध्रुवीकरण अहम है। भाजपा हिंदू वोटों के एकीकरण पर फोकस कर रही है, जबकि TMC मुस्लिम और अनुसूचित जाति वोटों के साथ अपनी योजनाओं पर भरोसा जता रही है। 88 प्रतिशत से अधिक के पिछले मतदान ने यह दिखाया है कि मतदाता भले ही खामोश हो, लेकिन निर्णायक है।

नंदीग्राम क्यों अहम?

नंदीग्राम सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के राजनीतिक पुनर्जन्म की जमीन है। 2007 में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन वह मोड़ बना, जिसने 'मां, माटी, मानुष' के नारे के साथ 34 साल की वाम सत्ता को खत्म कर 2011 में ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुंचाया। नंदीग्राम की इसी जमीन से ममता बनर्जी स्टार बनकर उभरीं हैं। पूर्वी मेदिनीपुर की राजनीति में अधिकारी परिवार का दबदबा रहा है। सिसिर अधिकारी के नेतृत्व में यह परिवार लंबे समय तक प्रभावी रहा। शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम आंदोलन के प्रमुख रणनीतिकार रहे, लेकिन 2021 से पहले भाजपा में शामिल होकर उन्होंने राजनीतिक समीकरण बदल दिए। पिछली बार 2021 के चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को 1,956 वोटों के मामूली अंतर से हराया था।