
पश्चिम एशिया में युद्ध के असर से भारत का एक भी व्यक्ति अछूता नहीं रह गया है। (Photos by Agencies)
अमरीका-इजरायल और ईरान के बीच चल रही लड़ाई के चलते पैदा हुई स्थिति को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना जैसी गंभीर चुनौती बताया है। उन्होंने कहा कि जैसी एकजुटता के साथ कोरोना-काल में हमने चुनौती का सामना किया, वैसी ही एकजुटता के साथ इस चुनौती का भी सामना करना होगा।
भारत के संदर्भ में बात करें तो यहां कोरोना-काल की तरह जान का खतरा नहीं है, लेकिन माल का काफी नुकसान हो रहा है और आम लोग परेशान हैं। इसका असर लंबे समय तक दिखेगा। शायद यही वजह है कि इस संकट पर पहली बार सदन में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने इसे कोरोना काल से जोड़ा। आगे पढ़ेंगे तो स्थिति की गंभीरता समझ में आएगी।
कोरोना संकट की तरह पश्चिम एशिया संकट से भी हर व्यक्ति प्रभावित हो रहा है। ट्रंप ने अपनी सनक में जो युद्ध छेड़ दिया, उससे भारत का हर एक शख्स प्रभावित है। कई चाय दुकानवालों ने दाम बढ़ा दिए हैं, कई ने चाय बनाना कम कर दिया है। वे सुबह और शाम के समय ही चाय बना रहे हैं, जब ग्राहक ज्यादा संख्या में आते हैं। कई दुकानदारों ने ग्राहकों को 'छोटी चाय' (दस के बजाय पांच रुपये में) पिलानी बंद कर दी है। मतलब लाखों लोगों का चाय का रोज का खर्च दोगुना हो गया है।
कई निजी स्कूलों ने बच्चों को खाना देने की पेड सुविधा बंद या कम कर दी है। कई दफ्तरों के कैंटीन में मैन्यू लिस्ट में केवल 'थाली' ही रह गई है। कई कैंटीन बंद होने के कगार पर हैं। कई ढाबे, रेस्तरां बंद हो चुके हैं या पहले की तुलना में काफी कम चीजें सर्व कर रहे और ज्यादा पैसे वसूल रहे हैं।
अनेक शहरों के कई नामी स्ट्रीट फूड वेंडर्स भी अपना काम समेट चुके हैं या दाम बढ़ा चुके हैं। 20 रुपये में छह गोलगप्पे के बदले चार खिलाए जा रहे हैं। इन सबका तर्क है कि एलपीजी सिलिंडर या तो मिल नहीं रहे या कालाबाजारियों से खरीदने पड़ रहे हैं। इनके मुताबिक एक घरेलू सिलिंडर के लिए 2200 से 3000 रुपये तक देने पड़ रहे हैं। फिर भी आसानी से मिल नहीं रहे। पहले 1000-1200 रुपये में बड़ी आसानी से मिल जाते थे। कमर्शियल सिलिंडर का भी यही हाल है। बेंगलुरु में एक कमर्शियल सिलिंडर 6000 रुपये तक में बेचे जाने की खबर भी आई। सरकारी अफसरों ने छापामारी करके कालाबाजारियों से 15000 से भी ज्यादा सिलिंडर बरामद किए हैं। कोरोना के समय ऑक्सीजन सिलिंडर के लिए जो मारामारी थी, उसे याद कीजिए।
शहरों में बड़ी संख्या में अकेले रहने वाले छात्र, मजदूर पांच किलो वाला छोटा सिलिंडर भरवा कर खाना पकाते हैं। इसमें गैरकानूनी तरीके से गैस भरी जाती है। पहले यह 60-70 रुपये किलो के दर से भरी जाती थी, जो अब 300 रुपये/किलो तक पहुंच गई है।
सिलिंडर के लिए घंटों कतारों में खड़े रहने का सिलसिला अभी भी जारी है। गांव-कस्बों में गैस वितरकों ने घर-घर सिलिंडर पहुंचाना बंद कर दिया है। बुकिंग के बाद उनका नंबर आ भी जाता है तो ग्राहकों को गोदाम पर बुला कर सिलिंडर दे रहे हैं। लोग अपना काम छोड़ कर सिलिंडर के लिए कतारों में घंटों खड़े रहते हैं। बुकिंग के बाद डिलीवरी में 10-15 दिन तक लग रहे हैं। रही है। अनेक लोग सोशल मीडिया के जरिए इसकी शिकायत कर रहे हैं।
अनेक गरीब परिवारों ने खाना पकाने के लिए लकड़ी का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। बड़े होटलों ने भी 'चूल्हा युग' में वापसी कर ली है। हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम (HPTDC)के होटल होलिडे होम (ट्रिपल-एच) में लकड़ी का विशाल पारंपरिक चूल्हा बना कर खाना बनाना शुरू कर दिया गया है।
मुंबई में 'डब्बा वाला' टिफिन सर्विस भी प्रभावित हुआ है। किसी ने टिफिन में डिश कम किया है, कई ने लकड़ी-कोयले का इस्तेमाल कर 'सिगड़ी' पर खाना बनाना शुरू किया है और कई ने काम बंद ही कर दिया है।
कई घरों, दुकानों और कैंटीन आदि में बिजली से चलने वाले इंडक्शन का इस्तेमाल किया जाने लगा है।
एचएसबीसी फ्लैश इंडिया पीएमआई कंपोजिट आउटपुट के आंकड़े बताते हैं कि निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियां मार्च में साढ़े तीन साल में सबसे निचले स्तर पर चली गईं। एचएसबीसी ने इसकी वजह पश्चिम एशिया में युद्ध की तबाही, घरेलू मांग में कमी, बाजार की अस्थिरता और महंगाई का दबाव बताया है। बता दें कि अमेरिका-इजरायल का ईरान पर पहला हमला 28 फरवरी को हुआ था।
एसबीआई के रिसर्च में बताया गया है कि तेल की कीमतें बढ़ने से वित्त वर्ष 2027 में विकास दर 0.25 फीसदी तक गिर सकती हैं। मूडी एनालिटिक्स ने अनुमान लगाया है कि युद्ध लंबा चला तो भारत का आर्थिक विकास दर गिर कर चार प्रतिशत के रेंज में जा सकता है। भारत 40 प्रतिशत तेल और 80 प्रतिशत गैस पश्चिम एशिया के देशों से ही मंगवाता है। इन्हें लाने का खर्च बढ़ेगा तो कई मोर्चे पर झटके लगेंगे। महंगाई तो बढ़ेगी ही, व्यापार घाटा बढ़ेगा और खर्च करने के लिए पैसों की कमी भी बढ़ेगी
दिल्ली स्थित थिंकटैंक ब्यूरो ऑफ रिसर्च ऑन इंडस्ट्री एंड इकनॉमिक फंडामेंटल्स (ब्रीफ) के अख्तर मलिक ने theguardian.com को बताया कि भारत ने कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार (53 लाख मीट्रिक टन का) तो बना रखा है, लेकिन एलपीजी के लिए ऐसा कोई बफर स्टॉक नहीं बनाया है। उनके मुताबिक, 'वैश्विक स्तर पर जरूरी ईंधन का अमूमन 40-60 दिन का सुरक्षित भंडार रखा जाता है। भारत के पास मात्र 20 दिन का एलपीजी भंडारण रहता है।'
भारत में खपत का 60 फीसदी एलपीजी आयात से ही आता है। इसमें से भी 90 फीसदी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते आता है। युद्ध के चलते इस रास्ते से सप्लाई प्रभावित हुई है। इससे निपटने के लिए सरकार ने एलपीजी का उत्पादन बढ़ाने के आदेश दिए हैं। वह दूसरे देशों से भी आयात कर रही है, लेकिन इसमें समय और खर्च ज्यादा लगता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि पहले भारत 27 देशों से ऊर्जा संबंधी जरूरतों के लिए आयात करता था, अब 41 देशों से कर रहा है। हालांकि, ध्यान रहे कि यह कदम युद्ध से पहले का है और कई महीनों से चल रहा है।
इस बीच सरकार ने एलपीजी सप्लाइ के लिए प्राथमिकता तय कर दी है। इसमें घरेलू उपभोक्ताओं, अस्पतालों, शिक्षण संस्थाओं आदि को पहले रखा गया है। धंधा-कारोबार करने वालों का नंबर बाद में आता है। यही वजह है कि रेस्तरां व होटल कारोबारियों पर एलपीजी संकट का ज्यादा असर है। जो ब्लैक में खरीद कर इसका बोझ ग्राहकों पर दाल कर मुनाफा कमा पा रहे हैं, वे किसी तरह काम जारी रखे हुए हैं। जो ऐसा नहीं कर पा रहे, वे काम समेट रहे हैं।
गैस पर निर्भर दूसरे कारोबार की भी हालत पतली है। मोरबी (गुजरात) में टाइल बनाने वाले कई कारोबारियों का काम ठप हो गया है। मोरबी टाइल बनाने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा केंद्र है। सैकड़ों फैक्ट्रियां बंद हो गईं या उनका उत्पादन कुछ समय के लिए रुक गया। मजदूर बेरोजगार हो गए। वे सामान समेट कर अपने-अपने गांव चले गए।
खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय काम करते हैं। उनके जरिए सालाना 50 अरब डॉलर भारत आया करते हैं। उनके काम पर संकट है। लड़ाई लंबी चली तो उन्हें घर वापस भी आना पड़ सकता है।
शेयर बाजार में गिरावट के चलते केवल सात दिनों में निवेशकों के 240 अरब डॉलर डूब गए। डॉलर के मुक़ाबले रुपये की कीमत सौ की ओर बढ़ रहा है। उधर कच्चा तेल भी महंगा हो रहा है। इससे तेल लाना और महंगा हो रहा है। विदेश से बाकी सामान मंगवाना भी खर्चीला साबित हो रहा है।
खाड़ी देशों को भारत से भेजा जाने वाला सामान नहीं जा पा रहा है। 2024-25 में भारत से 50,312 करोड़ रुपये का बासमती चावल विदेश भेजा गया। इसका करीब आधा केवल पांच देशों (सऊदी अरब, इराक, ईरान, यूएई और यमन) में गया था। युद्ध से बासमती चावल का निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
साफ है कि डोनाल्ड ट्रंप ने वो कदम उठा लिया है, जो हर भारतीय को संकट में डाल चुका है और यह संकट भारत तक ही सीमित नहीं है। इसलिए, इसका असर दूर तक और देर तक रहना तय है।
Published on:
26 Mar 2026 06:50 am
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