
ISRO से कितना अलग है NASA का वर्क कल्चर?
ISRO vs NASA work culture: इसरो में पिछले 10 महीनों में 100 इस्तीफों ने सरकार की नींद उड़ा दी है। वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारियों के इस तरह स्पेस एजेंसी छोड़ने से भविष्य के प्रोजेक्ट्स पर प्रभाव पड़ने की आशंका है। इस बीच, यह सवाल भी पूछे जा रहे हैं कि आखिर वैज्ञानिक इसरो क्यों छोड़ रहे हैं? क्या इसकी वजह महज पैसा है?
पिछले साल अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA भी इसी तरह वरिष्ठ अधिकारियों के इस्तीफे को लेकर चर्चा में आई थी। हालांकि, उनका इस्तीफा मजबूरी थी, क्योंकि डोनाल्ड ट्रम्प सरकार NASA के बजट में कटौती कर रही है और ऐसे में वर्कफोर्स में कमी लाजमी है। लेकिन भारत में ऐसी कोई ‘मजबूरी’ नहीं है। यहां वैज्ञानिक अपनी मर्जी से इसरो से दूर हो रहे हैं। तो ऐसे में एक सवाल उठता है कि क्या NASA में वर्क कल्चर इसरो से ज्यादा अच्छा है?
नासा और इसरो का मिशन भले ही एक हो, लेकिन दोनों के बीच जमीन आसमान का अंतर है। सबसे बड़ा अंतर तो बजट का ही है। 2025 तक नासा का सालाना बजट करीब 18 अरब डॉलर था। जबकि इसरो का वार्षिक बजट 1.7 अरब डॉलर के आसपास है। यानी नासा से 10% से भी कम।
इसके अलावा, नासा यानी नेशनल ऐरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन का दायरा अपेक्षाकृत ज्यादा व्यापक है। यहां काम करने का तौर-तरीका और ढंग इसरो से जुदा है। बड़ी टीम, बड़ी जिम्मेदारी और आगे बढ़ने के ज्यादा मौके। नासा अब स्पेसएक्स जैसी निजी कंपनियों के साथ मिलकर काम करता है, नतीजतन वैज्ञानिकों के पास काम करने के अधिक विकल्प और लचीलापन मौजूद है।
वहीं, इसरो अभी भी एक सरकारी संस्था है, जहां नौकरशाही का दबाव अधिक है। नासा स्वतंत्रता को अत्यधिक महत्व देता है और वैज्ञानिकों के काम के वाजिब दाम भी मिलते हैं। इसलिए रिटेन्शन रेट इसरो के मुकाबले अच्छा है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, नासा में रिसर्च साइंटिस्ट को सालाना करीब 70,000-1,50,000 डॉलर तक सैलरी मिलती है। यानी 67 लाख से 1.44 करोड़ रुपए। अनुभव और पद के साथ यह आंकड़ा और भी अधिक हो सकता है। वहीं, इसरो के नए साइंटिस्ट की सालाना कमाई लगभग 9 से 12 लाख तक होती है। ये भी एक वजह है कि वैज्ञानिक इसरो छोड़कर प्राइवेट कंपनियों का रुख करने लगे हैं। दरअसल, केंद्र सरकार ने 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने का निर्णय लिया था।
इसके बाद 2023 में भारतीय अंतरिक्ष नीति लागू हुई और इस क्षेत्र में स्टार्टअप्स तेजी से बढ़ने लगे। अब यही स्टार्टअप्स वैज्ञानिकों को आकर्षित कर रहे हैं। यहां उन्हें बड़ा पद और बड़ी सैलरी के साथ सम्मान भी ज्यादा मिलता है।
इसरो के पूर्व चेयरमैन डॉ. सोमनाथ भी चेन्नई की स्पेस स्टार्टअप कंपनी अग्निकुल कॉसमॉस के निदेशक मण्डल का हिस्सा बने हैं। वह चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग और भारत की पहली सोलर ऑब्ज़र्वेटरी 'आदित्य-L1' की लॉन्च का हिस्सा थे।
हालांकि, केवल पैसा ही वैज्ञानिकों के इसरो छोड़ने की एकमात्र वजह नहीं है। मिशन की धीमी होती रफ्तार, महत्वपूर्ण निर्णयों में देरी और फैसलों में कुछ चुनिंदा लोगों की भागीदारी भी प्रमुख हैं। कई बड़े मिशन, जिनमें गगनयान G1 टेस्ट फ्लाइट, SSLV-L1, GSLV-F17 और PSLV-N1 शामिल हैं, अपनी तय समय-सीमा से पीछे छूट गए हैं।
इस साल की शुरुआत में PSLV को मिली दोहरी नाकामियों ने लॉन्च की गतिविधियों में और देरी कर दी है, और इसरो ने अभी तक विफलता का विस्तृत विश्लेषण सार्वजनिक नहीं किया है। संगठन के कुछ हिस्सों में इस बात पर भी चर्चा बढ़ रही है कि फैसले लेने की प्रक्रिया ज़्यादा सेंट्रलाइज़्ड होती जा रही है। कई मौजूदा और पूर्व अधिकारी मानते हैं कि बड़े तकनीकी और प्रशासनिक फैसले अब चेयरमैन के ऑफिस तक ही सीमित हो गए हैं, जिससे मंज़ूरी मिलने में देरी होती है और काम करने के तरीके में लचीलापन कम हो जाता है।
इसरो गगनयान, चंद्रयान-4, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) और मंगलयान-2 जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है। अगर इसी तरह वैज्ञानिक उसका साथ छोड़ते रहे, तो बड़ी परेशानी हो सकती है। गगनयान इसरो का अत्यंत महत्वकनशी प्रोजेक्ट है, इसका लक्ष्य इंसान को अंतरिक्ष पर भेजना है और अगर वो इसमें कामयाब रहता है तो भारत ऐसा करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा।
केंद्र सरकार भी इस्तीफों से चिंतित है और उसने नौकरी छोड़ने की प्रक्रिया को सख्त करने का आदेश दिया है। लेकिन एक्स्पर्ट्स का मानना है कि सख्ती वैज्ञानिकों को अपने काम से दिल से जोड़े रखने में मददगार नहीं होगी। इसके बजाए, सरकार को उनके ‘मन’ की सुननी चाहिए। सैलरी स्ट्रक्चर मजबूत करना चाहिए, प्रमोशन के अधिक और आसान अवसर उपलब्ध कराने चाहिए। अन्यथा इसरो के लिए अपनी ऐतिहासिक पहचान को बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
Updated on:
18 Jul 2026 03:21 pm
Published on:
18 Jul 2026 03:20 pm
