
लोक सभा में बीजेपी की 31 महिला सांसद है (photo-IANS)
Women Representation Lok Sabha: लोक सभा में महिला आरक्षण संशोधन बिल (संविधान का 131वां संशोधन) पारित न हो पाने को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। विपक्ष पर केंद्र सरकार महिला विरोधी होने का आरोप लगा रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसको राजनीतिक मकसद से लाने का आरोप लगा रहा है। विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के जरिए सरकार परिसीमन कराना चाहती है।
भले ही राजनीतिक दल महिलाओं के अधिकार की बात करते हैं, लेकिन जमीनी हालत इसके बिल्कुल विपरित नजर आते है। विधानसभा से लेकर संसद तक महिलाओं की भागेदारी बहुत कम है।
1977-79 की 6वीं लोक सभा में महिलाओं की भागेदारी अब तक सबसे कम रही है। इस दौरान सदन में महज 3.5 प्रतिशत ही महिलाएं थीं। यह वही दौर था जब आपातकाल के बाद हुए चुनाव में तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी को हार का सामना करना पड़ा। हालांकि पिछली लोकसभा (2019-24) में महिलाओं की हिस्सेदारी अब तक की सबसे ज्यादा रही। 543 सीटों में 78 सांसद थे।
हालांकि समय के साथ महिलाओं की भागीदारी में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हुई है, लेकिन 10% के आंकड़े तक पहुंचने में भी देश को 15 आम चुनाव लग गए (2009 में 10.9%)। इससे साफ है कि बिना आरक्षण के 33% लक्ष्य हासिल करना अभी दूर की बात है।
लोक सभा में 10 या उससे ज्यादा सांसदों वाली पार्टियों में सिर्फ तृणमूल कांग्रेस ही ऐसी है, जहां महिलाओं की हिस्सेदारी 33% से ज्यादा है। TMC के 28 में से 11 महिला सांसद है। वहीं, सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी के 240 सांसदों में सिर्फ 31 महिलाएं हैं। कांग्रेस के 98 सांसदों में से 14 महिला सांसद है।
राज्य सभा में फिलहाल 245 में से 39 महिला सांसद हैं, यानी करीब 16% प्रतिनिधित्व। राज्यसभा में भी तृणमूल कांग्रेस सबसे आगे है, जहां उसके 13 में से 6 सांसद महिलाएं (करीब 46%) हैं। बीजेपी और कांग्रेस क्रमशः 17% और 17.2% के आसपास हैं।
इसके अलावा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में स्थिति और भी चिंताजनक है। छत्तीसगढ़ को छोड़कर किसी भी राज्य में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। छत्तीसगढ़ में 21.1 प्रतिशत महिलाओं का प्रतिनिधित्व है। इसके अलावा झारखंड में 14.8 प्रतिशत, हरियाणा में 14.4 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 13.6 प्रतिशत है।
सबसे कम हिस्सेदारी नागालैंड और पुडुचेरी में है। दोनों जगहों पर 3.3 प्रतिशत ही महिला प्रतिनिधित्व है। यह ध्यान देने वाली बात है कि जब 2023 में नागालैंड असेंबली के लिए दो महिलाएं चुनी गईं, तो यह पहली बार था जब महिलाएं राज्य विधानसभा में पहुंचीं।
वहीं चौंकाने वाली बात यह है कि 19 विधानसभाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी 10% से भी कम है। इसमें गुजरात 7.7%, महाराष्ट्र 7.6%, तमिलनाडु (7.3%, असम 5.5% और कर्नाटक 4.5% जैसे बड़े राज्य शामिल हैं।
इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन (IPU) द्वारा मेंटेन किए जाने वाले नेशनल पार्लियामेंट पर नज़र रखने वाले पारलाइन के अप्रैल 2026 के डेटा के अनुसार, महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत दुनिया के करीब 190 देशों में 147वें स्थान पर है। वहीं, रवांडा, क्यूबा, निकारागुआ, कोस्टा रिका, बोलिविया, मैक्सिको, अंडोरा और यूएई जैसे देशों में संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी 50% या उससे ज्यादा है। इसके अलावा करीब 56 देशों में यह आंकड़ा 33% से ऊपर है।
एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार, 1995 में दुनिया भर की संसदों में महिलाओं की हिस्सेदारी 11.3% थी, जो 2025 में बढ़कर 27.2% हो गई। हालांकि हाल के वर्षों में यह प्रगति धीमी पड़ी है।
रिपोर्ट बताती है कि जिन देशों ने आरक्षण, बेहतर चुनाव प्रणाली और महिला सुरक्षा जैसे कदम उठाए, वहां महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है।
असम, केरल और पुडुचेरी में मतदान हो गया है, जबकि पश्चिम बंगाल और कोलकाता में अभी वोटिंग होगी। इन राज्यों में विधानसभा चुनाव का परिणाम 4 मई को आएगा। इसके बाद इन जगहों पर महिलाओं के आंकड़ों में भी बदलाव देखने को मिलेगा।
Published on:
18 Apr 2026 02:07 pm
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