
नई दिल्ली। पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में चीनी की मात्रा पहचानने के लिए उपभोक्ताओं को जल्द एक आसान विकल्प मिल सकता है। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण पर संसद की स्थायी समिति ने चीनी का स्तर आसान तरीके से बताने वाली फ्रंट लेबलिंग की सिफारिश की है। आगे चलकर इसके लिए लाल-पीला-हरा जैसे कलर इंडिकेटर वाली व्यवस्था अपनाई जा सकती है, जिससे उपभोक्ता आसानी से कम, मध्यम और ज्यादा चीनी वाले उत्पाद की पहचान कर सकें। हालांकि, समिति ने फिलहाल किसी खास रंग-कोड को तय नहीं किया है। इसके साथ ही समिति ने ज्यादा चीनी वाले उत्पादों पर स्पष्ट चेतावनी देने और चार साल से लंबित इस व्यवस्था के नियमों को जल्द अंतिम रूप देने को कहा है। हालांकि, यह अभी सिफारिश है और नए नियम लागू नहीं हुए हैं।
फिलहाल पैकेट के पीछे पोषण संबंधी तालिका में चीनी की मात्रा ग्राम और दैनिक अनुशंसित मात्रा के प्रतिशत के रूप में दी जाती है। समिति का मानना है कि इन आंकड़ों को हर उपभोक्ता आसानी से नहीं समझ पाता। ऐसे में फ्रंट लेबल पर रंग आधारित इंडिकेटर्स से खरीदारी के समय कम, मध्यम और ज्यादा चीनी वाले उत्पाद की पहचान आसान हो सकती है।
जिस लेबलिंग व्यवस्था का मकसद उपभोक्ता को खरीदारी के वक्त ही उत्पाद की पोषण तस्वीर समझाना है, उसके नियम करीब चार साल से लंबित हैं। एफएसएसएआई ने 13 सितंबर 2022 को फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबलिंग के ड्राफ्ट नियम जारी किए थे। इन पर 14 हजार से ज्यादा टिप्पणियां और सुझाव मिले, लेकिन अब तक नियम अंतिम रूप नहीं ले सके। समिति ने देरी पर सवाल उठाते हुए नियमों को समयबद्ध तरीके से अंतिम रूप देकर अधिसूचित करने की सिफारिश की है।
समिति ने शिशुओं के दूध के फॉर्मूला में इस्तेमाल होने वाली चीनी के नियमों की भी समय-समय पर समीक्षा की जरूरत बताई है। अभी 0-6 महीने के बच्चों के फॉर्मूला में सुक्रोज या फ्रक्टोज तभी मिलाया जा सकता है, जब इसकी जरूरत कार्बोहाइड्रेट के स्रोत के रूप में हो। इसकी मात्रा फॉर्मूला में मौजूद कुल कार्बोहाइड्रेट की 20% से ज्यादा नहीं हो सकती। यह कार्बोहाइड्रेट सीमा करीब 13.25 ग्राम या 53 कैलोरी के बराबर है। यह 0-6 महीने के शिशु की 530 कैलोरी की कुल दैनिक ऊर्जा जरूरत का करीब 10% है।
समिति ने इस सीमा की हर 2-3 साल में वैज्ञानिक आधार पर समीक्षा करने की सिफारिश की है, ताकि नई वैज्ञानिक जानकारी के मुताबिक नियम बदले जा सकें।
समिति ने ‘नो एडेड शुगर’ और ‘नेचुरल स्वीटनर’ जैसे दावों को लेकर भी चिंता जताई है। ऐसे दावों की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच और प्रमाणन व्यवस्था मजबूत करने की सिफारिश की गई है। मकसद यह है कि पैकेट पर लिखे स्वास्थ्य संबंधी दावों और वास्तविक सामग्री के बीच अंतर न रहे और उपभोक्ता को गुमराह न किया जा सके।
समिति ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बिकने वाले खाद्य उत्पादों की लेबलिंग पर भी निगरानी मजबूत करने की जरूरत बताई है। गलत लेबलिंग वाले उत्पादों की पहचान कर उन्हें ऑनलाइन लिस्टिंग से रियल टाइम में हटाने की व्यवस्था मजबूत करने का सुझाव दिया गया है।
समिति ने माना कि ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य लेबल को समझना उपभोक्ताओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए स्कूलों, आंगनवाड़ी केंद्रों, पंचायतों और मातृत्व केंद्रों के जरिए पोषण लेबल समझाने के लिए जागरूकता अभियान चलाने की सिफारिश की गई है।
प्रतिदिन 25 ग्राम चीनी : आईसीएमआर की 2024 डाइटरी गाइडलाइंस के मुताबिक चीनी का सेवन 25 ग्राम प्रतिदिन तक सीमित रखना बेहतर है। समिति ने इसे उपभोक्ता जागरूकता अभियान में सरल तरीके से बताने की सिफारिश की है।10% ऊर्जा की सीमा : डब्ल्यूएचओ ने वयस्कों और बच्चों दोनों के लिए फ्री शुगर का सेवन कुल दैनिक ऊर्जा सेवन के 10% से कम रखने की सिफारिश करता है। इसे 5% से कम करने पर अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं।
कम चीनी क्यों? रिपोर्ट में वैश्विक शोध का हवाला देते हुए कहा गया है कि बचपन में ज्यादा चीनी का सेवन आगे चलकर दांतों की सड़न, मोटापा, मेटाबॉलिक गड़बड़ियों, टाइप-2 डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के बढ़े जोखिम से जुड़ा है।
400 से ज्यादा ईट राइट मेले : रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 2024 में देशभर में नए सत्र के साथ ‘ईट राइट मेले’ शुरू किए गए। अब तक 400 से ज्यादा ईट राइट और मिलेट्स मेले आयोजित किए जा चुके हैं, जिनमें करीब 20 लाख लोगों की भागीदारी रही।
Updated on:
27 Aug 2026 11:47 am
Published on:
27 Aug 2026 11:47 am
